गीतिका

फागुन आया

जगती मन में इक आस नयी,पर्वों की कथा पुरानी है ।
जो देश काल को जोड़ चले,वह नीति प्रथा अपनानी है। 1

फाग उड़ाता फागुन आया,जब हरे भरे खलिहानों से,
धरा करे शृंगार लहर कर,चूनर पहिने फिर धानी है । 2

कोयल कूके अमराई में,बौरे रसाल मदमस्त करे,
टेसू पलाश भी रंग भरे, फूलों ने चादर तानी है । 3

जब मन मधुकर खोले पाँखें,पात पात सरसाये पुलकित,
सुख सपनों में डूबे असीम,हम राह नहीं अनजानी है ।4

शाश्वत कीर्ति भरत भूमि की,अक्षुण्ण रहे जीवन दर्शन,
संस्कृति अपनी श्रेष्ठ सदा ही,नित सत्य कहे कवि बानी है ।5

बोध आत्मबल सैन्य शक्ति से,आन्दोलित अपना जन मानस,
राजनीति की चाल त्रासदी,क्यों बढा़ रहे अभिमानी है ।6

है भोग वाद के पीछे हम,क्यों राष्ट्र प्रेम निष्फल होता,
“तू ही हम सबको राह बता”,क्या अपना कोई सानी है 7
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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