“समय हमारा दास नहीं”
“सजल गीतिकाव्य”
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चिंतन-मंथन-अभ्यास नहीं।
यह समय हमारा दास नहीं।।
कथनी-करनी में भेद न हो।
है लक्ष्य-भेद परिहास नहीं।।
क्या बैठ किनारे सोच रहे?
इससे बुझती बस प्यास नहीं।।
फिरते ठग हैं साधु-वेश में।
केवल भगवा संन्यास नहीं।।
अवशेष सुधारें जीवन का।
क्या;मृत्यु खड़ी है पासनहीं??
चुनकर गंतव्य चले थे हम।
सौदा सच्चा आभास नहीं।।
‘लता’लगी है चिंता मुझको।
टूटे मन का विश्वास नहीं।।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


