• गीतिकाव्य

    “मौन हुई अमराई”

    गीतिकाव्य ********** कौन सँदेशा लाए आली, कागा बिना मुंँडेर। मौन हुई अमराई मानो, अमवा झरे न बेर।। सूखी ताल-तलइया पनघट, प्रखर सूर्य के ताप। सूनी गागर लेकर प्यारी, बोली आँख तरेर।। प्यासे घूमे दीन बटोही, तरुतल मिले न छाँव। श्वेत-श्याम घन भरदो आकर,अक्षय पात्र सुमेर।। व्योम चढ़ा जो दंभ दिखाता, घन-घमंड दूँ तोड़। खेल रहा क्यों निपट अनाड़ी, तीतर-लड़ा बटेर।। मोर-पपीहा खगकुल,दादुर, झींगुर की अनुगूँज। बूँद-बूँद सरसाए बरखा, बदरी छाए घेर ।। लता-प्रेम की सींचें माली,अंक खिले जलजात। हरित धरा पर प्रेमिल धारा, बरसे लगा न देर।। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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