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“संसृति की यह गोद”
संसार की सुंदरता ——————— #गीत लेकर आयीं सुधियांँ अपनी, प्रेम भरा आधार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। बीते पल को कौन भुलाए, अनहोनी बेमेल । कुछ छूटे कुछ छोड़ चले सब, संबंधों का खेल। वर्ष-वर्ष की बात और क्या, मिल बैठै दो चार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। धरा-गगन के मध्य समन्वय, जिसका ओर न छोर। सरस लुटाती प्रकृति संपदा, नाचे मन का मोर। आतीं-जातीं ऋतुएं देतीं, अनुपम अपना प्यार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। नक्त-दिवस-आपाधापी में, संसृति की यह गोद। बचपन-यौवन-तरुणाई तक, भरता मन आमोद। अनहद नाद भरे सरगम ये, खोले हृद के द्वार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर…
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“निराशा हो जगत से दूर”
आधार छंद विधाता….. दिया प्रभु ने बहुत हमको उसे अर्पण करेंगे हम। उठो जीवंत साधक मन शोध चिंतन करेंगे हम। निराशा हो जगत से दूर सार्थक राह अपनाकर। जगा विश्वास तन-मन लोक का रंजन करेंगे हम। विवश करती रही तृष्णा खिलौना बन गया मानव। उठाया अब कदम हमने,सजग मंथन करेंगे हम । विवादों से घिरा जीवन न जीना है गवारा अब! बढ़े जागृति मनोबल भी, नहीं क्रंदन करेंगे हम। रखेगी-लेखिनी पावन धरा की मान मर्यादा! बहाकर काव्य की धारा सही मंचन करेंगे हम। बहुत खोया न खोना कुछ मिटा भ्रम को बढ़ें आगे सजा नगमें विधाता के अधर सावन करेंगे हम । लता संगिनि बनेगी नित्य कोमल मन नहीं हारे।…
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“आशा की अभिलाषा पूरी”
*स्वर की देवी आशा भोंसले* #श्रद्धांजलि: स्वर-अमरता को समर्पित #गीत छोड़ जगत को जाने वाली, गुंजित स्वर संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। प्यार भरे वे सुर अब गूँजे, अधर-अधर मुस्कान। श्वासों ने बन्धन तोड़े सब, स्मृतियांँ हुई महान। राग-रागिनी रजनीगंधा, अलख जगाती प्रीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। अगन लगाती शरद कौमुदी, विरहन के हिय द्वंद। अश्रु थिरे कोरों से टप-टप, लिखते अन्तिम छंद। बहे सुनामी उर-थल कंपित, मौन हुआ संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ’आशा’ कोकिल अमराई की, लेतीं अब विश्राम। विदा लिया केवल नश्वर ने, परम मुक्ति अभिराम। नमन तुम्हें हे! स्वर की देवी, भाव भरे मनमीत। आशा की अभिलाषा…
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“सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां”
#गीत सत्य-अहिंसा-सघन साधना,अश्रु नहीं प्रिय प्रणय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। संघर्ष बहुत थे पग-पग अपने, है अतीत की गहरी गाथा। काट तिमिर को जागृति आयी, मिली फतह से उन्नत माथा। सीख दिया है जिसने हमको, वृथा नहीं अब अनय चाहिए । जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। मयदानव सम खड़ी सामने, अट्टहास कर गईं वृत्तियां । बिगुल बजा पंचास्य नाद का, सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां । आज समर्पण की बेला में, धर्म-नीति का विलय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। व्यर्थ गंवाकर जन-धन सपने, कुटिल नीति मुस्कानें भरती । बनी रुदाली सिसक रही है, अंक लिए…










