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शारदीय नवरात्रि का स्वागत ….
गीत ! कोकिल रव ने गीत सुनाए, प्रीति जगाए दूना । गूँज रही अमराई फिर भी, “प्रेम बिना सब सूना” अनजानी राहों पर चलते, मिलते मीत पुराने ! खोल हृदय ने दिया निमंत्रण, खुशियों – भरे तराने ! अधरों ने रसपान किया फिर, लगा न ‘कत्थाचूना’ कोकिल रव ने गीत सुनाए, प्रीति जगाए दूना । पीर हृदय की बाँट निभाए, कहते पीर पराई। शुष्क धरा का आँचल जिसमें, अपनापन गहराई। उड़ी तितलिका रंग बिरंगी,अंतस को यह छूना। कोकिल रव ने गीत सुनाए, प्रीति जगाए दूना । “प्रेम बिना सब सूना” कैसे, संस्कृति का हर कोना। झूम उठी लेकर हरियाली, लिए शारदी दोना। ‘लता’प्रेम की पुण्य पुष्प ले, धूनि रमाए धूना।…
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“मन-मयूर मुस्काए”
-गीत——————- उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। उड़ते पाखी दल से खेले पवन बावरा चंचल। सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी। गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी। इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए । पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा , भीगा मन्मथ डोले। कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले। आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए । पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। *********************डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
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“समय हमारा दास नहीं”
“सजल गीतिकाव्य” °°°°°°°°°°°°° चिंतन-मंथन-अभ्यास नहीं। यह समय हमारा दास नहीं।। कथनी-करनी में भेद न हो। है लक्ष्य-भेद परिहास नहीं।। क्या बैठ किनारे सोच रहे? इससे बुझती बस प्यास नहीं।। फिरते ठग हैं साधु-वेश में। केवल भगवा संन्यास नहीं।। अवशेष सुधारें जीवन का। क्या;मृत्यु खड़ी है पासनहीं?? चुनकर गंतव्य चले थे हम। सौदा सच्चा आभास नहीं।। ‘लता’लगी है चिंता मुझको। टूटे मन का विश्वास नहीं।। डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
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जन्माष्टमी 2026
योगिराज श्रीकृष्ण के विराट रूप को नमन ! #गीत अधर बाँसुरी निर्विकार मन, सरल गांभीर्य अपार। शांत चित्त,वे स्थिर प्रज्ञ का, दिव्य दिखा अवतार। पार्थ मोह के घन कानन में, उदेति गीता सूर्य । अस्त्र,-शस्त्र के बिना समर में, चमके बन वैदूर्य। युद्धभूमि के सिद्ध सारथी , महायोग के द्वार। राधा-प्रेमी, मीरा-दर्पण, सखा-सुदामा सेतु। काल कंस का धर्म रक्षक, फहराया था केतु। योगीश्वर लीलाधर करते, संकट का संंहार । वन-वन डोले वैरागी तन, भव बंधन से दूर। वश में करते नयन भृकुटि से, मंत्र सिद्ध कर्पूर। माखनचोर कहें गोकुल के, श्यामल नंद कुमार। “योगिराज” तुम वही कृष्ण हो,घट-घट पाया दीप्य। हर लीला में रहकर जिससे, अर्थ सहित सामीप्य। समदर्शी प्रभु…
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आँधी/तूफान +++++ ‘सजल’ लहरों से लड़ता जाता है, माँझी ले पतवार। बिना थके जो बढ़े निरंतर, कर जाता वह पार॥ उफन रहा है रत्नाकर भी,गरजे-बरसे मेघ। जीती बाजी तूफानों से, जोश हर-एक बार॥ गहरे जल में राह बनाता, हिम्मत रखें बुलंद। धीर-वीर हो सच्चा माँझी,अनुपम खेवनहार॥ गहरे मुक्ता-माणिक जिसमें,गहरी नियमित खोज। थाम लिया जीवट परिपाटी, मेटे जग अँधियार॥ ‘लता’विकल है चिंतन भारी,बढ़े हृदय को चीर। मुस्काए जो संकट में भी, साधे अपनी धार॥ ——————–डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
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बरसे घन उद्दाम आज भी।।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.अनिल गहलौत मथुरा निवासी ने मेरा साहित्यिक उपनामकरण ‘लता’ @(१९/७/२०२६ से) किया है। सधन्यवाद आदरणीय को! #सजल समांत–आम/पदांत–आज भी मात्रा भार -१६ ********* लगे विधाता वाम आज भी। छिड़ा हुआ संग्राम आज भी।। रोया मानस पीर जगाकर। प्रेम-प्रकृति अभिराम आज भी।। लिए मनुज-तन जग में आए। जीते हम निष्काम आज भी।। भोग रही काया माया में। कर्म लिखे परिणाम आज भी।। अंग-अंग में प्रीति जगातीं। राधे तुम सुखधाम आज भी।। चले राम जी त्याग अवध को। जग गाता है नाम आज भी।। ‘लता’ प्रेम की कहे कहानी। बरसे घन उद्दाम आज भी।।- *डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी ‘लता’* ————– १९/७/२०२६ समांत-वाम,संग्राम,अभिराम,परिणाम,धाम, नाम, उद्दाम।
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“मेघ मल्हार की सरगम पर”
गीतिका गूंँज उठी अमराई जैसे, कोकिल रव ने गीत लिखा । अनजानी राहों पर चलते, मिलते ज्यों मन मीत लिखा । उड़ी तितलिका रंग बिरंगी, झूम उठी क्यारी-क्यारी, देख निराली सुन्दरता को,मन हो आशातीत लिखा । रस के लोलुप भ्रमर वृंद भी, बड़े सयाने लगते हैं, क्रीड़ा करते मनुहारी पर, कलियों का मन भीत लिखा। मेघ मल्हार की सरगम पर,दिया निमंत्रण बरखा को, शुष्क धरा का फैला आँचल, खुशियों ने संगीत लिखा! लता नहाई रिमझिम बूंदन,गागर से सागर सरसे, बही प्रेम की धारा निर्मल, किंचित हार न जीत लिखा! पार लगाओ भव बंधन से, मुक्त करो मिथ्या जग से, कुछ अनहोनी हो न सके, संशय ने विपरीत लिखा। ‘लता’प्रेम की…
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“मौन हुई अमराई”
गीतिकाव्य ********** कौन सँदेशा लाए आली, कागा बिना मुंँडेर। मौन हुई अमराई मानो, अमवा झरे न बेर।। सूखी ताल-तलइया पनघट, प्रखर सूर्य के ताप। सूनी गागर लेकर प्यारी, बोली आँख तरेर।। प्यासे घूमे दीन बटोही, तरुतल मिले न छाँव। श्वेत-श्याम घन भरदो आकर,अक्षय पात्र सुमेर।। व्योम चढ़ा जो दंभ दिखाता, घन-घमंड दूँ तोड़। खेल रहा क्यों निपट अनाड़ी, तीतर-लड़ा बटेर।। मोर-पपीहा खगकुल,दादुर, झींगुर की अनुगूँज। बूँद-बूँद सरसाए बरखा, बदरी छाए घेर ।। लता-प्रेम की सींचें माली,अंक खिले जलजात। हरित धरा पर प्रेमिल धारा, बरसे लगा न देर।। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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कृषि प्रधान यह देश।
सत्य सनातन अपनत्व भरा, ग्राम-नगर उन्मेष । किरणों के रथ बैठ दिवाकर, प्राच्य लिए संदेश । भूलें मत सदियों से अपनी, संस्कृति का उदघोष, जय जवान से जय किसान तक, भाव-भरे परिवेश। चोला पहने नित वासंती, अखंड भारत भूमि, । लिए सबेरा कर्मठ बढ़ता, कृषि प्रधान यह देश। सजी धरा हो हरियाली से, लगे मोहिनी रूप चूनर धानी हरी बालियां, देख मिटे मन क्लेश। सुजलां सुफलां शस्य श्यामलां, राष्ट्रगीत हो पूर्ण, एक राष्ट्र हो अखण्ड भारत, लक्ष्य सिद्ध आदेश। कदम-कदम पर ओज-बढ़ाए,सत्साहस समवेत अ़द्भुत अविरल अभिन्न अर्णव, जागरूक अनिमेष । खेतों से खलिहानों तक, गर्वित रहे किसान, ‘लता’ प्रेम की शाख बढ़े नित, क्षीण न हो लवलेश। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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“प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण”
अग्नि/पावक/आग #गीत समिधा जलती हवि के कारण, होता पुण्य प्रवाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। अग्नित्रयी की ऊर्जा पावन, सहज संतुलन सार । प्रथम जिसे ‘जठरानल’ कहते, पाचन का आधार। कहते द्वितीय ‘वाडवानल’ अथ,करते विज्ञ विमर्ष। उठते ज्वार,ज्वालामुखी का, रहस भरा उत्कर्ष। जलधि ताप को करे संतुलित,ऊर्जा लिए अथाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। पावक तृतीय ‘दावानल’ द्रुत, आदि जगत का खोज। भस्म करे जो स्वतः अरण्य को, घर्षण दाहक ओज। संत सुसंगत आवाहन से, यज्ञ धूम सत्कार्य। विमल शोध शोधन-शाला में, वेद-निहित आहार्य। प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण, उत्तम यह निर्वाह। जप-तप माला छाप-तिलक से, मिटे न अंतर दाह। दग्ध करे ईर्ष्या जनमानस, गढ़ती नित्य तिलस्म।…




















