• गीतिका

    आभार की कहानी।

    गरिमामयी कहानी जीवंत सच लिखेगी ये लेखनी कहानी। आभार शब्द का है आभार की कहानी। शब्दों सहित तुम्हारी हित भाव व्यंजना को माना सुहासिनी हो गरिमामयी कहानी। तन-मन सँवार देती ये मौन अर्चना से, वाणी उजास भरती संसार की कहानी। सबको गले लगाया अभिनीत कर दिखाया, संवाद की पुजारन संगीत सी कहानी। कंचन बरन समाहित इसकी सजग है लीला, स्याही कमाल करती उपजी सही कहानी। आँसू भले बहाती है मान लोचनों की, असहाय की दशा में रोती रही कहानी। संभावना लिए जो इतिहास बांँचती है, कहती ‘लता’ समेकित शिक्षा भरी कहानी। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    “एक और सांँझ ढल गई”

    #गीत ​ सजी सुनहली यादें लेकर, इक सांँझ ढल गई। बात सुनाती हवा समय की, आगे निकल गई। ​मुस्कान लिए धीमी जैसे, ढलने सूर्य लगा। ​भीड़भाड़ से दूर, जहाँ तम- छलने हमें लगा। एक बात थी खामोशी में, सिमटी संँभल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। छाँव तले ऊँचे से नीचे। पथ की हरियाली। पगडंडी से उतर रही है, गहराती लाली। मौन-बीच सफेद फूलों से, मुलाक़ात उसकी। बीते कल के खुले झरोखे, सँवरी मचल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। जगमग में डूबे द्वार सभी, गूंगे बहरों की । सुविधाएं कितनी; आजादी, खोयी शहरों की । उन्मुक्त भाव से जीवन का, रहना निगल गई।…

  • #गीत

    “संसृति की यह गोद”

    संसार की सुंदरता ——————— #गीत लेकर आयीं सुधियांँ अपनी, प्रेम भरा आधार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। बीते पल को कौन भुलाए, अनहोनी बेमेल । कुछ छूटे कुछ छोड़ चले सब, संबंधों का खेल। वर्ष-वर्ष की बात और क्या, मिल बैठै दो चार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। धरा-गगन के मध्य समन्वय, जिसका ओर न छोर। सरस लुटाती प्रकृति संपदा, नाचे मन का मोर। आतीं-जातीं ऋतुएं देतीं, अनुपम अपना प्यार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। नक्त-दिवस-आपाधापी में, संसृति की यह गोद। बचपन-यौवन-तरुणाई तक, भरता मन आमोद। अनहद नाद भरे सरगम ये, खोले हृद के द्वार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर…

  • गीतिका

    “निराशा हो जगत से दूर”

    आधार छंद विधाता….. दिया प्रभु ने बहुत हमको उसे अर्पण करेंगे हम। उठो जीवंत साधक मन शोध चिंतन करेंगे हम। निराशा हो जगत से दूर सार्थक राह अपनाकर। जगा विश्वास तन-मन लोक का रंजन करेंगे हम। विवश करती रही तृष्णा खिलौना बन गया मानव। उठाया अब कदम हमने,सजग मंथन करेंगे हम । विवादों से घिरा जीवन न जीना है गवारा अब! बढ़े जागृति मनोबल भी, नहीं क्रंदन करेंगे हम। रखेगी-लेखिनी पावन धरा की मान मर्यादा! बहाकर काव्य की धारा सही मंचन करेंगे हम। बहुत खोया न खोना कुछ मिटा भ्रम को बढ़ें आगे सजा नगमें विधाता के अधर सावन करेंगे हम । लता संगिनि बनेगी नित्य कोमल मन नहीं हारे।…

  • गीतिका

    “आशा की अभिलाषा पूरी”

    *स्वर की देवी आशा भोंसले* #श्रद्धांजलि: स्वर-अमरता को समर्पित #गीत ​छोड़ जगत को जाने वाली, गुंजित स्वर संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। प्यार भरे वे सुर अब गूँजे, अधर-अधर मुस्कान। श्वासों ने बन्धन तोड़े सब, स्मृतियांँ हुई महान। राग-रागिनी रजनीगंधा, अलख जगाती प्रीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ​अगन लगाती शरद कौमुदी, विरहन के हिय द्वंद। अश्रु थिरे कोरों से टप-टप, लिखते अन्तिम छंद। बहे सुनामी उर-थल कंपित, मौन हुआ संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ​’आशा’ कोकिल अमराई की, लेतीं अब विश्राम। विदा लिया केवल नश्वर ने, परम मुक्ति अभिराम। नमन तुम्हें हे! स्वर की देवी, भाव भरे मनमीत। आशा की अभिलाषा…

  • गीतिका

    “सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां”

    #गीत सत्य-अहिंसा-सघन साधना,अश्रु नहीं प्रिय प्रणय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। संघर्ष बहुत थे पग-पग अपने, है अतीत की गहरी गाथा। काट तिमिर को जागृति आयी, मिली फतह से उन्नत माथा। सीख दिया है जिसने हमको, वृथा नहीं अब अनय चाहिए । जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। मयदानव सम खड़ी सामने, अट्टहास कर गईं वृत्तियां । बिगुल बजा पंचास्य नाद का, सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां । आज समर्पण की बेला में, धर्म-नीति का विलय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। व्यर्थ गंवाकर जन-धन सपने, कुटिल नीति मुस्कानें भरती । बनी रुदाली सिसक रही है, अंक लिए…

  • गीतिका

    “प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं”

    प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं #गीत टूट न जाना संघर्षों में,समय सही का साथ निभाना । शर्त यही कर्त्तव्य नेक हों,अनहोनी पर क्या पछताना । आशा पग-पग राह दिखाती । नींव-इमारत को बनवाती । एक एक कर सजें कँगूरे, मन ही मन निश्चित मुस्काती । सुख-दुख में दर्पण सम होना ,मुखर आइने से बतियाना । अनहोनी पर क्या पछताना ———–! भूली बिसरी गति श्वाँसों में । छिपी कामना अहसासों में । “प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं” व्यर्थ न करना उपहासों में कोमल सपने उर में जागें,बस मूल मंत्र सा हो जाना अनहोनी पर क्या पछताना ———–! पूर्ण करें हम कर्ज समय का। दृढ़ निश्चय हो मान अभय का । यहीं…

  • गीतिका

    “तुमुल युद्ध की परिणति”

    सजल बंजर होती धरती देखें, हुई प्रकृति भी बाम । तुमुल युद्ध की परिणति देखें, कैसा यह संग्राम।। हिला विश्व का कोना-कोना, छिड़ी हुई मुठभेड़। कुटिल नीतियांँ बाज न आएं,नहीं साम औ दाम।। वैमनस्य आपद कारी यह, द्वैष बढ़ा मतभेद। देव-धरा का साथ निभाना, छोड़ो सारे काम।। शांति-दूत हम सत्य-सनातन, देख सके न जंग। मिलकर हम संकल्प उठाएं, जगती पर हो नाम।। मिट न सके चंदन की गरिमा, विषधर लिपटे अंग। बारूदी संघर्ष कटे अब , मिट जाए ये झाम ।। वैर-भाव की बातें ओछी, नेक हृदय निष्कर्ष । ईश प्रार्थना संकट काटें, मनके-मन के राम।। स्वप्न ‘लता’ के होंगे पूरे, घूमें देश विदेश । चढ़ा सकूँ पुष्पों की माला,…

  • #गीत

    “स्वागत में सतरंगी आभा”

    #होलीकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं! #गीत हाट-बाट सब रंग-बिरंगे,हरित-पीत नभतल अरुणाई। स्वागत में सतरंगी आभा,धूम-धाम से होली आई। छटा बिखेरे रंगों वाली, बालवृंद की अनुपम टोली। तन को-मन को चले भिगोने, भरकर वे खुशियों से झोली। मस्ती करते सखा सँगाती, पीकर नाचे ज्यों ठण्डाई। स्वागत में सतरंगी आभा, धूम-धाम से होली आई। धूप सलोनी आँगन परसे, प्रीति लगाए मन को भाए। खुले केश सजनी के लहरे, पवन निगोड़े रास रचाए। शीत चली मदमाती पीहर,गुनगुन गाती ज्यों फगुआई। स्वागत में सतरंगी आभा, धूम-धाम से होली आई। ढोल-थाप पर नाचे गाएं भंग घोलते जन हुरियारे। मुखर हुए ठण्डाई पीकर, झूम उठीं गलियांँ चौबारे। चंचरीक कलियों में अनबन,रंग देख दोड़ें भरमाई। स्वागत में सतरंगी…

  • #गीत

    “कमनीय किलोल कलहंस के”

    गीत निखर उठी सरसों पियराई। पुनि आए ऋतु कंत सखी री! प्रीतम प्यारी झूमें अंँगना। संँवरी धरा अनन्त सखी री! पहन प्रवासी पीत-पगड़िया,फाग उड़ाए रसिक बिहारी। भंग पिए ज्यों झूमें गाए,नगर ग्राम औ उपवन क्यारी। फर-फर उड़े श्वेत गंधकी,सुरभित करे दिगंत सखी री! निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री! कमनीय किलोल कलहंस के,प्रिया रसिक सह रास रचाए। खग की बतिया खग ही जाने, चपल चंचरी चंचु उठाए। भरमाए अनजान पथिक को,विवश हुए मन संत सखी री! निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री! कंचन वर्णी विमल रूपसी, रूप निहारे सजनी दर्पण। रश्मिरथी नित भुवन भास्कर,अंग समाए पिय सरस स्फुरण । शगुन सुनाए पिय की पाती,…

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