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    वसंतोत्सव

    #गीत हुई निनादित मौन अर्चना, हर्षित मन उद्गार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार । पृष्ठ-पृष्ठ पर अंकित कथनी, करते हम जीवंत । आती-जाती ऋतुएँ कहतीं, सुंदर सुखद बसंत । एकाकी मुस्कान भरे मन,आखर लगे बयार। वनबाग उपवन ताल सगरे,हमने लिए उधार। विरह-मिलन की त्रिगुण भाव की, उद्यम करते काव्य । सरल नहीं है इन्हें साधना, श्रम करता संभाव्य । साक्षी हैं वाणी के साधक,कलम करे अभिसार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार। श्रद्धानत करते चरित्र जो, कलम लिखे जयबोल । लिख जाते अध्याय जहाँ, घर आँगन भूगोल । मन की गागर सागर बनकर,’लता’बढ़े अविकार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार। —————————डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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    वसंतोत्सव (14फरवरी)

    #गीत हुई निनादित मौन अर्चना, हर्षित मन उद्गार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार । पृष्ठ-पृष्ठ पर अंकित कथनी, करते हम जीवंत । आती-जाती ऋतुएँ कहतीं, सुंदर सुखद बसंत । एकाकी मुस्कान भरे मन,आखर लगे बयार। वनबाग उपवन ताल सगरे,हमने लिए उधार। विरह-मिलन की त्रिगुण भाव की, उद्यम करते काव्य । सरल नहीं है इन्हें साधना, श्रम करता संभाव्य । साक्षी हैं वाणी के साधक ,कलम करे अभिसार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार। श्रद्धानत करते चरित्र जो, कलम लिखे जयबोल । लिख जाते अध्याय जहाँ, घर आँगन भूगोल । मन की गागर सागर बनकर,’लता’ बढ़े सितधार । वनबाग उपवन ताल सगरे, हमने लिए उधार। —————————डॉ.प्रेमलता…

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    अभिनंदन “श्रीराम” जी

    #गीत हे! अनुरागी श्री राम पिया,मैं झुकि-झुकि करूँ नमन । नैना भीगे अविराम पिया,मैं झुकि-झुकि करूँ नमन । जाग उठे कोरक नलिनी के मधुकर के फेरों में । तुम से जागृत लोकपाल हे ! हिय श्वसन घेरों में । त्रेता सी कलयुगी धारणा, ले आये कमल नयन । हे! अनुरागी श्री राम पिया,मैं झुकि-झुकि करूँ नमन । लोल कपोलों की छवि मोहक, सजल नयन ये नीरज। अंग अनंग विभोर करे मन थिर न सके मन धीरज । चित्रलिखित भे हीरे माणिक, कटितट निरखे करधन । हे! अनुरागी श्री राम पिया,मैं झुकि-झुकि करूँ नमन। अवध पुरी का आँगन हर्षित, झूम उठे गलियारे । शोभित चहुँदिक देव भूमि यह, झूमर बंदनवारे ।…

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    “राम-राम कह अलख जगा लें,”

    #गीत भाल लगाए रोली चंदन, दर्शन कर श्री धाम। राम-राम कह अलख जगा लें,बनते बिगडे़ काम। राम चरित की पावन गाथा, हमसब का आदर्श, हरि अनंत की कथा सनातन,जीवन का प्रतिदर्श । हिय कटुता की भेंट चढ़े मत,व्यर्थ सभी आलाप, राम सरिस आदर्श पुत्र को,शत-शत करूँ प्रणाम। राम-राम कह अलख जगा लें, बनते बिगडे़ काम। अनुपम शोभा दाशरथी की,कोमल कांति सु चित्त, कर्म भूमि हित सधी प्रत्यंचा,अनुपम जीवन वृत्त । राम-राम मुख आ न सके जो, नहीं कटे संताप, बढ़ते दुसह्य संताप कठिन, उनको दें विश्राम । राम-राम कह अलख जगा लें, बनते बिगडे़ काम। रचते हैं श्रीराम जहाँ पर, स्वयमेव अनुभाव, नारी का सम्मान लिए नित,बढ़ती जाए नाव। राम…

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    “मावस भरे अँजोर”

    #गीत? भाव भरे करसंपुट दीपक, दीप्त करे चहुँओर । रिद्धि सिद्धि से सोहे अँजुरी,मावस भरे अँजोर । थाल सजाकर फूल नारियल, सुरभित कर परिवेश। पूजा करती अँगना अँगना, लक्ष्मी सह प्रथमेश । हाथ जोड़ सब शीष नवाते,ज्योति जले प्रतिछोर । रिद्धि सिद्धि से सोहे अँजुरी,मावस भरे अँजोर । दान भोग औ नाश यही हो, सत्य सही संकल्प । सार्थक हो निज धर्म-कर्म से, क्षुधित न कोई अल्प। राम राज की पुनः कल्पना, लाए प्रतिपल भोर । रिद्धि सिद्धि से सोहे अँजुरी,मावस भरे अँजोर । लता प्रेम की शाख-शाख पर, बढ़ती जाये मीत। वर्ष वर्ष पर दीप दिवाली, झिलमिल गाये गीत । लड़ियों औ फुलझड़ियों से चहुँ,धूम मचे प्रिय शोर ।…

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    ध्रुवक साधना

    #गीत (छंद सरसी) धवल चँद्रिका शरद चंद्र की,अनुपम रूप मयंक। अंबर का शृंगार तुम्ही से, श्वेत स्वच्छ अकलंक । रंग भरे सपनों की कलशी, सजी तारिका नेक । ध्रुवक¹ साधना छंद सृजन के , भाव भरे अतिरेक । दर्शन दुर्लभ तीज-चौथ के,साधक उत्कट बंक² । अंबर का शृंगार तुम्ही से,श्वेत स्वच्छ अकलंक । झरे बूँद रिमझिम तुषार के, सुखदा कांति विशेष, अमिय कमंडल लेकर आये, तृषा मिटी अनिमेष । शुभ्र वेश उन्मेष सजाये, चातक लगे सशंक । अंबर का शृंगार तुम्ही से,श्वेत स्वच्छ अकलंक । साज सरस से छेड़ रागिनी, रीझे शारद विज्ञ, जगा रही ज्यों अलख ज्योत्सना, अनुरागी अनभिज्ञ । वश में अपने कर लेती जो, राजा हो या…

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    “प्यारी लोरी गीत बनी”

    #गीत गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये । आज बहुत ही खुश हूँ प्रियवर,तुम मेरे सपने में आये। हीरा माणिक अंक सजाकर, तुम को पाया आँचल में । बिछुड़े थे हम कहाँ तुम्हारे, बहकर गाते काजल में । आँख ढरे सुरमा सुषमा से,बूँद जहाँ गलने में आये। गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये । प्यारी लोरी गीत बनी जब, माँ की गोदी गुलजार हुई । दो नयनों की दूरी जैसे – अब कोरों के अनुसार हुई । इतनी यादें कहाँ समेटूँ, प्रात सहज जगने में आये। गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये । जोड़ दिया अपना हमसाया, नेह सजल नित अरमानों…

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    “कहाँ संँजोये जोगन”

    #गीत अरी बावरी पथ में बैठी,अपलक किसे निहारे । पिया बटोही रमता जोगी, ठहरे किसके द्वारे । रीत रही मन की गागर ये,मधुशाला जीवन की, खोज रहा हिय सार जगत में,बीते अपने पन की उन बिन ये शृंगार सखी जी,सूना सावन-भादौ, विरह प्रीति अनजान पथिक से,कोर भिगोते खारे । पिया बटोही रमता जोगी, ठहरे किसके द्वारे । घन घननाद करे उन्मादी,नदिया बहती धारा । छलतीं हिय में कोरी बतियाँ,दिन में देखूँ तारा । सखी लुभाये चंद्र चकोरी,किस्से इनके अनगिन, मिलन विरह की पीर निगोड़ी,अपनों से ही हारे। पिया बटोही रमता जोगी, ठहरे किसके द्वारे । लता प्रेम की सींच रहे ये,धीर नयन के अंजन। दाँव पेंच सब लाज धरम को,कहाँ…

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    “धर्म नीति भावों की सरिता”

    #गीत जल में थल में धरा गगन में,तुम बिन कौन सँवारे । मंत्र मुदित मनभावन मंगल, सबको ईश उबारे । मरकत मणिमय निहित सरोवर, किरण प्रभा छवि गुंफित । सुखद सलोनी आभा अविरल, पात-पात पर टंकित। निखर उठा है पंकिल तन ये,मुकुलित नैन निहारे । मंत्र मुदित मनभावन मंगल, सबको ईश उबारे । मीन उलझती रही निरापद, शैवालों में खेले । सरसिज काया मदमाती यों, अगणित बाधा झेले। सतह-सतह पर कुटिल मछेरे,बगुले हिय के कारे । मंत्र मुदित मनभावन मंगल, सबको ईश उबारे । लता सीख देती ये कणिका, मन को करें न दूषित। धर्म नीति भावों की सरिता, निश्चित होगी भूषित । नया सबेरा फिर-फिर आये, कर्मठ मंत्र उचारे…

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    ‘राज इसका कहें आज किससे’

    #गीत प्रीति सरगम लुभाती बहुत है। मृत्यु अंतस दुखाती बहुत है। राज इसका कहें आज किससे, बन ये’ परिहास जाती बहुत है। ——— छद्म दुनिया करे तो जले मन । खोट मन की छुपाता रहे तन । धर्म के काज में भी कुटिलता, नित तृष्णा के छाये रहे घन । घूमती स्वार्थ घाती बहुत है । बन ये’ परिहास जाती बहुत है। ——— प्राण पिंजर बँधा जानते जो। हाथ मलते गया मानते जो । शाम ढलती कहें उम्र की हम, चादरें यों सदा तानते जो । साँझ ऐसी रुलाती बहुत है । बन ये’ परिहास जाती बहुत है। ——— है न सावन झड़ी फागुनी ये। रंग बरसा गयी जामुनी ये।…

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