• गीतिका

    सुभाषिणी हिन्दी (छंद पारिजात)

    मुक्तक रीत सावन सरस निभाऊँ मैं। मीत कान्हा तुम्हें रिझाऊँ मैं। नैन ढूँढे सखा सुहाने दिन, संग झूलूँ तुम्हें झुलाऊँ मैं। धुंध नीरस नहीं बसेरा हो। कर उजाले जहाँ अँधेरा हो। आपसी द्वंद्व को बढ़ाना क्यों, नित्य सर्जन लिए सवेरा हो। सत्य सरला सुभाषिणी हिन्दी। भव्य अपनी स्वरागिनी हिन्दी। देव वाणी मधुर पुनीता तू, वेद छंदानुगामिनी हिन्दी। दीप संध्या सनेह हो बाती। अर्चना भी सप्रेम हो गाती। कर्मणा शुद्ध हो मधुर पथ जो, साधना भी अजेय हो जाती। डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    #गीत जीवन के हर पथ पर हम को,मिला सभी का प्यार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । चाहे सुख के दिन हो चाहे, हो अँधियारी रात । पीड़ा की सौगात कभी थी, खुशियों की बारात । इसी तरह मिलजुल कर हमने,स्वप्न किया साकार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । पग-पग आती बाधाओं में, साथ चले निर्बाध । थे अनजाने पथिक जहाँ हम, फिर भी स्नेह अगाध । निराकार साकार रूप में, मिला मुझे आधार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । विनती है मेरी बस इतनी, साथ न छूटे कंत । इस अटूट…

  • गीतिका

    ‘मलमास’

    ——– सजल भोर जगे नित शंखनाद से, साँझ भजन शिवशंकर। गूँज उठे ‘मलमास’ दिवस ये,ज्योति जले अभ्यंतर।। स्वत: सिद्ध ये अतल-वितल में, सिद्धांतों की गरिमा। वश में करना इंद्रिय-निग्रह, चाह नहीं गिरि-कंदर।। पीसन वाली प्रियतम प्यारी, संयम गीत सुनाए। चलती चकरी घूम रही प्रभु, लेकर माया अंतर।। बांँध रहे निज ध्येय-प्रेय को, दो पाटों के संयम। सकल मनोरथ पूर्ण करें जो,पीर समेटे अन्दर।। ताल नियंत्रित जीवन दर्शन,अर्पित तन अविकारी। जीवन सच की यह परछाईं, मध्य धरा से अंबर।। लता-प्रेम की बढ़ती जाए, भाव-भूमि बटछाया। अभिमंत्रित यह कर्म-योगिनी,संसृति सत्य स्वयंवर।। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    मातृ-दिवस

    ‘सजल’ याद मुझे है अपना बचपन, श्वाँसें मेरी प्रतिपल गातीं। माँ की अनुपम अनगढ़ बातें, प्रथम गुरु बन राह दिखातीं।। मिला जनम ये श्रेय तुम्ही हो, उसका कोई मोल नहीं है। मूँद लिया ज्यों पलकें अपनी, माँ तुम ही धड़कन बन जातीं।। नहीं तृप्त हैं नयन हमारे, भूल सके कब हँसता शैशव। हृदय समायीं सुंदर छवियाँ, जब अतीत से मन बहलातीं।। मातु विधाता सम हितकारी, तेरा आँचल मेरा वैभव । काँधे माँ के झुके न हारे, करुणा-वारिधि प्यार लुटाती।। तुमको देखा अपने अंतस, बनी साधना अनुपम पथ ये। चंचल बयार निःशब्द डगर, मंदिर-मदिर मन को महकातीं।। माँ की लोरी प्रीति अनकही, छलके जब ममता के आँसू । भावों का उद्गम…

  • गीतिका

    आभार की कहानी।

    गरिमामयी कहानी जीवंत सच लिखेगी ये लेखनी कहानी। आभार शब्द का है आभार की कहानी। शब्दों सहित तुम्हारी हित भाव व्यंजना को माना सुहासिनी हो गरिमामयी कहानी। तन-मन सँवार देती ये मौन अर्चना से, वाणी उजास भरती संसार की कहानी। सबको गले लगाया अभिनीत कर दिखाया, संवाद की पुजारन संगीत सी कहानी। कंचन बरन समाहित इसकी सजग है लीला, स्याही कमाल करती उपजी सही कहानी। आँसू भले बहाती है मान लोचनों की, असहाय की दशा में रोती रही कहानी। संभावना लिए जो इतिहास बांँचती है, कहती ‘लता’ समेकित शिक्षा भरी कहानी। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    “एक और सांँझ ढल गई”

    #गीत ​ सजी सुनहली यादें लेकर, इक सांँझ ढल गई। बात सुनाती हवा समय की, आगे निकल गई। ​मुस्कान लिए धीमी जैसे, ढलने सूर्य लगा। ​भीड़भाड़ से दूर, जहाँ तम- छलने हमें लगा। एक बात थी खामोशी में, सिमटी संँभल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। छाँव तले ऊँचे से नीचे। पथ की हरियाली। पगडंडी से उतर रही है, गहराती लाली। मौन-बीच सफेद फूलों से, मुलाक़ात उसकी। बीते कल के खुले झरोखे, सँवरी मचल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। जगमग में डूबे द्वार सभी, गूंगे बहरों की । सुविधाएं कितनी; आजादी, खोयी शहरों की । उन्मुक्त भाव से जीवन का, रहना निगल गई।…

  • #गीत

    “संसृति की यह गोद”

    संसार की सुंदरता ——————— #गीत लेकर आयीं सुधियांँ अपनी, प्रेम भरा आधार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। बीते पल को कौन भुलाए, अनहोनी बेमेल । कुछ छूटे कुछ छोड़ चले सब, संबंधों का खेल। वर्ष-वर्ष की बात और क्या, मिल बैठै दो चार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। धरा-गगन के मध्य समन्वय, जिसका ओर न छोर। सरस लुटाती प्रकृति संपदा, नाचे मन का मोर। आतीं-जातीं ऋतुएं देतीं, अनुपम अपना प्यार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। नक्त-दिवस-आपाधापी में, संसृति की यह गोद। बचपन-यौवन-तरुणाई तक, भरता मन आमोद। अनहद नाद भरे सरगम ये, खोले हृद के द्वार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर…

  • गीतिका

    “निराशा हो जगत से दूर”

    आधार छंद विधाता….. दिया प्रभु ने बहुत हमको उसे अर्पण करेंगे हम। उठो जीवंत साधक मन शोध चिंतन करेंगे हम। निराशा हो जगत से दूर सार्थक राह अपनाकर। जगा विश्वास तन-मन लोक का रंजन करेंगे हम। विवश करती रही तृष्णा खिलौना बन गया मानव। उठाया अब कदम हमने,सजग मंथन करेंगे हम । विवादों से घिरा जीवन न जीना है गवारा अब! बढ़े जागृति मनोबल भी, नहीं क्रंदन करेंगे हम। रखेगी-लेखिनी पावन धरा की मान मर्यादा! बहाकर काव्य की धारा सही मंचन करेंगे हम। बहुत खोया न खोना कुछ मिटा भ्रम को बढ़ें आगे सजा नगमें विधाता के अधर सावन करेंगे हम । लता संगिनि बनेगी नित्य कोमल मन नहीं हारे।…

  • गीतिका

    “आशा की अभिलाषा पूरी”

    *स्वर की देवी आशा भोंसले* #श्रद्धांजलि: स्वर-अमरता को समर्पित #गीत ​छोड़ जगत को जाने वाली, गुंजित स्वर संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। प्यार भरे वे सुर अब गूँजे, अधर-अधर मुस्कान। श्वासों ने बन्धन तोड़े सब, स्मृतियांँ हुई महान। राग-रागिनी रजनीगंधा, अलख जगाती प्रीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ​अगन लगाती शरद कौमुदी, विरहन के हिय द्वंद। अश्रु थिरे कोरों से टप-टप, लिखते अन्तिम छंद। बहे सुनामी उर-थल कंपित, मौन हुआ संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ​’आशा’ कोकिल अमराई की, लेतीं अब विश्राम। विदा लिया केवल नश्वर ने, परम मुक्ति अभिराम। नमन तुम्हें हे! स्वर की देवी, भाव भरे मनमीत। आशा की अभिलाषा…

  • गीतिका

    “सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां”

    #गीत सत्य-अहिंसा-सघन साधना,अश्रु नहीं प्रिय प्रणय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। संघर्ष बहुत थे पग-पग अपने, है अतीत की गहरी गाथा। काट तिमिर को जागृति आयी, मिली फतह से उन्नत माथा। सीख दिया है जिसने हमको, वृथा नहीं अब अनय चाहिए । जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। मयदानव सम खड़ी सामने, अट्टहास कर गईं वृत्तियां । बिगुल बजा पंचास्य नाद का, सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां । आज समर्पण की बेला में, धर्म-नीति का विलय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। व्यर्थ गंवाकर जन-धन सपने, कुटिल नीति मुस्कानें भरती । बनी रुदाली सिसक रही है, अंक लिए…

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