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श्रीराम-स्तुति
श्रीराम-स्तुति …….. कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे। नहीं धुरंधर आज जगत में,जो तुमबिन संबल वारे। तृषा विश्व की कौन बुझाए,दुख दारुण देकर दूने, मन की गागर कौन भरेगा,कोर हुए जब-जब सूने । अवध पुरी को जगमग कर दो,तमसावृत अँधियारे कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे । कृष्ण-केश से शृंग सुहाए,है दिशाहीन क्यों बदरी, सुखद रश्मि से कंत भानु की,पुनि रिमझिम भीगे सदरी। प्राण कृषक के जनजीवन के,नयना सींचे कजरारे, कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे । अपनेपन की पाती लेकर,प्रिय पवनपुत्र का आना, भेद न कोई मन में उनके,शुचि मंत्र-पूत पथ नाना । चक्रवात से घिरा चतुर्दिक, जैसे घूमें बंजारे, कर जोड़े सब…
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“श्रीराम स्तुति”
श्रीराम-स्तुति …….. कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे। नहीं धुरंधर आज जगत में,जो तुमबिन संबल वारे । तृषा विश्व की कौन बुझाए,दुख दारुण देकर दूने, मन की गागर कौन भरेगा,कोर हुए जब-जब सूने । अवध पुरी को जगमग कर दो,तमसावृत अँधियारे कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे । कृष्ण-केश से शृंग सुहाए, है दिशाहीन क्यों बदरी, सुखद रश्मि से कंत भानु की,पुनि रिमझिम भीगे सदरी। प्राण कृषक के जनजीवन के,नयना सींचे कजरारे, कर जोड़े सब करें वंदना,प्रिय आओ रघुवर प्यारे । अपनेपन की पाती लेकर,प्रिय पवनपुत्र का आना, भेद न कोई मन में उनके,शुचि मंत्र-पूत पथ नाना । चक्रवात से घिरा चतुर्दिक, जैसे घूमें बंजारे, कर…
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“विश्व हिन्दी दिवस”
#गीत आगत का है स्वागत करना,संस्कृति का आधार लिए। मंत्र सिद्ध अनुशासित जीवन, नेकी सद आचार लिए। घटती-बढ़ती नित्य पिपासा, पथ की बाधा बने नहीं । अधरों की चाहत रखने में, हाथ झूठ से सने नहीं । सत्यमेव जयते हो प्रतिपल,नैतिकता का सार लिए । आगत का है स्वागत करना,संस्कृति का आधार लिए। भूले बिसरे गीत सुनाती, प्यार भरी जग की बातें । हँसते-रोते हमने खोया, अनगिन सांसें दिन रातें । अवशेष सजाना होगा हमको,स्नेह जगत व्यवहार लिए। आगत का है स्वागत करना,संस्कृति का आधार लिए। पूरब की लाली से सुंदर, वर्ष ईसवी सदी गयी । नूतन अनगढ़ भाव व्यंजना, सुबह हमारी सांझ नयी । “लता” पुनः नव पत्र संँवारे,…
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“आओ आज सँवारे”
#गीत (आज का परिदृश्य) ——————– कल किसने देखा है साथी, आओ आज सँवारे ।, चिंतन के सब तर्क अधूरे , कहते आँसू खारे । डोर कहीं बुझती सांसों की सोया हुआ सबेरा । दीप जलाना भूल गए हम, जागृत हुआ अँधेरा । इन नयनों की चाहत रखना,वश में नहीं हमारे । चिंतन के सब तर्क अधूरे , कहते आँसू खारे । नहीं असंभव कुछ भी बंधू, सोच समझ कर बढ़ना । विश्वयुद्ध की ओर बढ़े सब, बैठे लेकर धरना । लगभग सबकुछ देख लिया है,जीत लिए क्या हारे । चिंतन के सब तर्क अधूरे, कहते आँसू खारे । शहर,गांव,गलियों थारों के, किस्से सुनिए अनगिन । टूट पड़ा है जनमानस अब,…