• गीतिकाव्य

    “मौन हुई अमराई”

    गीतिकाव्य ********** कौन सँदेशा लाए आली, कागा बिना मुंँडेर। मौन हुई अमराई मानो, अमवा झरे न बेर।। सूखी ताल-तलइया पनघट, प्रखर सूर्य के ताप। सूनी गागर लेकर प्यारी, बोली आँख तरेर।। प्यासे घूमे दीन बटोही, तरुतल मिले न छाँव। श्वेत-श्याम घन भरदो आकर,अक्षय पात्र सुमेर।। व्योम चढ़ा जो दंभ दिखाता, घन-घमंड दूँ तोड़। खेल रहा क्यों निपट अनाड़ी, तीतर-लड़ा बटेर।। मोर-पपीहा खगकुल,दादुर, झींगुर की अनुगूँज। बूँद-बूँद सरसाए बरखा, बदरी छाए घेर ।। लता-प्रेम की सींचें माली,अंक खिले जलजात। हरित धरा पर प्रेमिल धारा, बरसे लगा न देर।। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • सजल

    कृषि प्रधान यह देश।

    सत्य सनातन अपनत्व भरा, ग्राम-नगर उन्मेष । किरणों के रथ बैठ दिवाकर, प्राच्य लिए संदेश । भूलें मत सदियों से अपनी, संस्कृति का उदघोष, जय जवान से जय किसान तक, भाव-भरे परिवेश। चोला पहने नित वासंती, अखंड भारत भूमि, । लिए सबेरा कर्मठ बढ़ता, कृषि प्रधान यह देश। सजी धरा हो हरियाली से, लगे मोहिनी रूप चूनर धानी हरी बालियां, देख मिटे मन क्लेश। सुजलां सुफलां शस्य श्यामलां, राष्ट्रगीत हो पूर्ण, एक राष्ट्र हो अखण्ड भारत, लक्ष्य सिद्ध आदेश। कदम-कदम पर ओज-बढ़ाए,सत्साहस समवेत अ़द्भुत अविरल अभिन्न अर्णव, जागरूक अनिमेष । खेतों से खलिहानों तक, गर्वित रहे किसान, ‘लता’ प्रेम की शाख बढ़े नित, क्षीण न हो लवलेश। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    “प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण”

    अग्नि/पावक/आग #गीत समिधा जलती हवि के कारण, होता पुण्य प्रवाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। अग्नित्रयी की ऊर्जा पावन, सहज संतुलन सार । प्रथम जिसे ‘जठरानल’ कहते, पाचन का आधार। कहते द्वितीय ‘वाडवानल’ अथ,करते विज्ञ विमर्ष। उठते ज्वार,ज्वालामुखी का, रहस भरा उत्कर्ष। जलधि ताप को करे संतुलित,ऊर्जा लिए अथाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। पावक तृतीय ‘दावानल’ द्रुत, आदि जगत का खोज। भस्म करे जो स्वतः अरण्य को, घर्षण दाहक ओज। संत सुसंगत आवाहन से, यज्ञ धूम सत्कार्य। विमल शोध शोधन-शाला में, वेद-निहित आहार्य। प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण, उत्तम यह निर्वाह। जप-तप माला छाप-तिलक से, मिटे न अंतर दाह। दग्ध करे ईर्ष्या जनमानस, गढ़ती नित्य तिलस्म।…

  • सजल

    “सरल-विरल अनुरागी मन”

    गूंँज उठी अमराई जैसे, कोकिल रव ने गीत लिखा । अनजानी राहों पर चलते, मिलते ज्यों मन मीत लिखा । उड़ी तितलिका रंग बिरंगी, झूम उठी क्यारी-क्यारी, देख निराली सुन्दरता को,मन हो आशातीत लिखा । रस के लोलुप भ्रमर वृंद भी, बड़े सयाने लगते हैं, क्रीड़ा करते मनुहारी पर, कलियों का मन भीत लिखा। मेघ मल्हार की सरगम पर,दिया निमंत्रण बरखा को, शुष्क धरा का फैला आँचल, खुशियों ने संगीत लिखा! लता नहाई रिमझिम बूंदन,गागर से सागर सरसे, बही प्रेम की धारा निर्मल, किंचित हार न जीत लिखा! पार लगाओ भव बंधन से, मुक्त करो मिथ्या जग से, कुछ अनहोनी हो न सके, संशय ने विपरीत लिखा। ‘लता’प्रेम की बढ़ती…

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