• गीतिका

    राहें बनाती है।

    मापनी – 1222 1222 1222 1222 समान्त – आती पदांत – है गीतिका नयन से दूर हो जो तुम,उदासी यह न जाती है । सुखद यादें जहाँ हर पल,हमें यों ही सताती है । तड़पना यह जरूरी है,सही अहसास का होना, निकट हों फासले मन में,करीबी यह न भाती है । चलो अच्छा हुआ अपने,पराये का पता होना, दुखों में साथ जो अपने,कहानी वह सुहाती है । भटकते भाव मधुरिम जो,उबरते डूब कर ही हम, मुझे तुमसे तुम्हें मुझसे, यही हमको मिलाती है बनाकर राह बढ़ते खुद,सहज पाते स्वयं को हम, जहाँ बंधन लगे रिश्ते, न ये चाहत कहाती है । सबेरा नित किया करती,चहकती प्रीति अभिलाषा, महकती शाख वह…

  • गीतिका

    गूँजती पद चाप

    गीतिका —- गूँजती पद चाप जो उर में समाते तुम रहे । राग की रोली बिखेरे पथ दिखाते तुम रहे । शून्य अधरों पर हया मुस्कान बन कर छा गयी, प्यास जन्मों के विकल मन की बुझाते तुम रहे। कंटकों में राह तुमने ही बनायी दूर तक, फूल बनकर श्वांस में यों पास आते तुम रहे । लौट आओ हर खुशी तुमसे जुड़ी हैआस भी, धूप की पहली किरण बनकर सजाते तुम रहे । हो हृदय नायक इशा विश्वास भी तुमसे सभी , स्वप्न सारे पूर्ण हों राहें बनाते तुम रहे। जल रहा मन द्वेष से हर पल विरोधी सामना, मूल्य जीवन का सतत यों ही सिखाते तुम रहे ।…

  • गीतिका

    साधना के पथ बहुत हैं !

    गीतिका सत्य सार्थक सर्वदा ही पर प्रमुखता है कहाँ ? नित्य हों अपवाद रिश्तों में निकटता है कहाँ ? है सरल संकल्प लेना,हो निभाना मानिए, साधना के पथ बहुत है पर सहजता है कहाँ ? कृत्य की अनदेखियाँ,हो रहीं व्यापक सभी लूटते यूँ अस्मिता जो,फिर मनुजता है कहाँ ? पुस्तकों तक जो सिमटती,लेखनी का मान क्या, दृश्य हैं पाठक नहीं वे, वह विकलता है कहाँ ? लेखनी शृंगार लिखती,मान दे उपमान को, शुद्धता मन की नहीं तो,दृग उरझता है कहाँ ? कवि हृदय में गीत हो संगीत अनहद साधना, ताल-लय-गति भाव बोधक,हिय समझता है कहाँ । प्रेम का उद्गार सच्चा, यदि लगन सच्ची रहे, खोज लेती हर विधा को,मन सँभलता…

  • गीतिका

    गजानन

    #गजानन आओ मेरे द्वार । सुखद तुम मूषक सजे सवार । विराजो गौरी अंक गणेश, तुम्हारी महिमा अपरम्पार । छंद – दिग्बधू ( मापनीयुक्त) 221 2122 221 212 गीतिका —- अंतस विमल करो हे देवा नमन तुम्हें। दे दो सदा रहे यों खुशियाँ सदन हमें । ममता लुटा रही माँ मलयज बयार सी, स्वागत अँगन हमारे कर दो मगन हमें । चाहे न लेखनी यह आसन उधार अब, हिंदी प्रखर बने दो रसना दसन हमें । मुक्ता लड़ी बनाऊँ आखर सँवार दूँ , चाहूँ न मौन व्रत अब करना सृजन हमें । बन प्रेम इन दृगों में मनमोर नाचता, दो शारदीय आभा शोभित गगन हमें । डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी 19/303…

  • गीतिका

    गजानन

    #गजानन आओ मेरे द्वार । सुखद तुम मूषक सजे सवार । विराजो गौरी अंक गणेश, तुम्हारी महिमा अपरम्पार । छंद – दिग्बधू ( मापनीयुक्त) 221 2122 221 212 गीतिका —- अंतस विमल करो हे देवा नमन तुम्हें। दे दो सदा रहे यों खुशियाँ सदन हमें । ममता लुटा रही माँ मलयज बयार सी, स्वागत अँगन हमारे कर दो मगन हमें । चाहे न लेखनी यह आसन उधार अब, हिंदी प्रखर बने दो रसना दसन हमें । मुक्ता लड़ी बनाऊँ आखर सँवार दूँ , चाहूँ न मौन व्रत अब करना सृजन हमें । बन प्रेम इन दृगों में मनमोर नाचता, दो शारदीय आभा शोभित गगन हमें । डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी 19/303…

  • गीतिका

    रातें गयीं सुहानी

    आधार छंद दिग्पाल गीतिका — बिसरे नही तुम्हें हम,यादें अभी पुरानी । तुमने भुला दिया जो,घडियाँ बनी कहानी । मन में नहीं दुराशा, गाते रहे तराने, मुझको सजा मिली क्यों,रातें गयीं सुहानी । देते रहे सजा तुम,रातें कटे न दिन वे, उनको रही सजाये,ढलती गयी जवानी । पलभर न चैन आये,बातें लगीं अजब सी, सजते रहे नजारे, सदियाँ हुईं रवानी । पथ प्रेम का सहज ये,मंथन करें सभी मिल, शुचिता भरें हृदय में,करिए नहीं अमानी । ————————-डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    रातें गईं सुहानी

    आधार छंद दिग्पाल गीतिका — बिसरे नही तुम्हें हम,यादें अभी पुरानी । तुमने भुला दिया जो,घडियाँ बनी कहानी । मन में नहीं दुराशा, गाते रहे तराने, मुझको सजा मिली क्यों,रातें गयीं सुहानी । देते रहे सजा तुम,रातें कटे न दिन वे, उनको रही सजाये,ढलती गयी जवानी । पलभर न चैन आये,बातें लगीं अजब सी, सजते रहे नजारे, सदियाँ हुईं रवानी । पथ प्रेम का सहज ये,मंथन करें सभी मिल, शुचिता भरें हृदय में,करिए नहीं अमानी । ————————-डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    सरस प्रेम को रोपना जानती हूँ !

    आधार छंद- भुजंग प्रयात मापनी -122,122,122,122 समान्त- अना पदान्त – जानती हूँ ! ~~~~~~~~~~~~~~~~ गीतिका लिखूँ मैं सहज सर्जना जानती हूँ । मिथक को सभी तोड़ना जानती हूँ । सधे सिद्धियाँ सत्य आधार माना, रहित छद्म से अर्चना जानती हूँ । दिशा ज्ञान लेकर बढ़ी हर कदम मैं, नहीं हार को मानना जानती हूँ । विकलता न उपहास अज्ञानता वश, नहीं सुप्त हूँ जागना जानती हूँ । जगे लेखनी त्रस्त देखूँ धरा जब, विकट आपदा रोकना जानती हूँ । सुमन पाँखुरी से खिले वाटिका ज्यों, सरस प्रेम को रोपना जानती हूँ । डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    जयहिंद हिन्द की सेना

    वंदेमातरम् —- मातृभूमि तेरा अभिनंदन लिखनी अमर कहानी है । नैन भिगाती उनकी गाथा, जिसने दी कुर्बानी है । वर्ष जहाँ बीते पचहत्तर ,बातें लगती ये कल की, #जन गण मन है राष्ट्रगान ये,गाकर याद दिलानी है । साक्षी है इतिहास आज भी,रक्त सनी थी धरती माँ, एक-एक कतरों की कीमत,तब हमने पहिचानी है । नहीं दिवाली जली होलिका, वीर सपूतों के आँगन, डरी नहीं बारूदों से जो, माटी यह बलिदानी है । नींद कहाँ थीं चैन गँवाये,लडे़ सूरमा रातो-दिन जय हिंद हिंद की सेना की,साहस कथा जुबानी है । देश-प्रेम की गौरवगाथा,सहज प्रवाहित नस-नस में, उन्नत मस्तक आज लिए ये,कहती मुखरित बानी है। ******************* डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    कड़ियाँ मीठी-खट्टी ।

    आधार छंद- “विष्णुपद” (मापनीमुक्त मात्रिक) विधान- 26 मात्रा, 16-10 पर यति, अंत में वाचिक गा. विष्णुपद = चौपाई + 10 मात्रा (समकल) समांत _ अर पदांत _ गयीं गीतिका — पलकों में जैसे यादों की,मुक्ता ठहर गयीं । कड़ियाँ मीठी-खट्टी जिनकी,जाने किधर गयीं । नित अनजाने भय में अपने,दिन औ रैन किया, ईश तुम्हारी नगरी सगरी, कैसी बिखर गयीं । जिन अपनों को खोया हमने,कोई लौटा दे, पलतीं अवसादों की धारा,छलकीं-लहर गयीं । जीवन की आपा धापी में,किस्से हैं अनगिन, दोषी ये दुनिया या खुद की,कमियाँ सुधर गयीं । कर असीम काँटों का संचय,तथ्य गया-गुज़रा, ठहर गया हो सावन या के,बरखा गुजर गयीं । संबल प्रेम ; न हमदर्दी हो,यदि…

  • गीतिका

    किरणें हँसती जब अंचल में !

    आधार – तोटक (वर्णिक) मापनी – 112×4, अथवा सगण ×4 समांत – अल पदांत – में गीतिका —– मन उत्पल कुंज खिले जल में । ठहरी मृदु बूँद कनी दल में । वसुधा अपनी छविमान हुई, किरणें हँसती जब अंचल में ! नव प्रात लिए रवि नंदित है, यह शुभ्र वितान सजा पल में । दिशि रक्तिम भाल सुहाग भरी, विहगावलि गान करे तल में । गुणगान करें मन क्यों उनका, सत दीन हुआ जब साँकल में । नित दर्द सहे जन जीवन जो उनमाद नशा भरते छल में । सत प्रेम सुधा हर आँगन हो अनुराग भरो कहती कल में । डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    दृग झरना सीख

    गीतिका ज्योति जलेगी स्नेह तरल नित,भरना सीख । करुण सदय हो निर्झरिणी दृग,झरना सीख । दूषित करते पावन नद को, गिरते क्षार , दोष रहित जल सुरसरि निर्मल,करना सीख। महक उठे निष्कंटक पथ हो,चल कर साथ, सुमन पथी तू सुरभित हो मन,हरना सीख । नवल चेतना भर ले तन-मन,गायें गीत चरैवेति सिद्धांत सहज है, चरना सीख, साहस खोकर जीवन कैसा,सुख-दुख भोग, काया तो क्षणभंगुर है मत, डरना सीख । सेवा कर पितु मातु हितों की,मिलता पुण्य, सतत कर्म रत भव सागर से,तरना सीख । भ्रमर गूँज से खिली वाटिका,महके प्रेम, अनुयायी सौरभ का बन पग,धरना सीख । ———– डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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