• #गीत

    धूप छाँव है कहुँ घेरे बदरिया –

    गीत —– —- धूप छाँव है कहुँ घेरे बदरिया । मदन बाण तरकश लेकर संँवरिया —- चंचल बयरिया सजन मन भावै। सुध-बुध छीनै ये जिया तड़पावै । अँगना में बोलै सुगन हरजाई । छल-छल छलके है काँधे गगरिया, धूप छाँव है कहुँ घेरे बदरिया ——-। सतरंगी आभा किरण बगरा के । इंद्र-धनुष जो तना गहरा के । कटि बलखावे बावरो पग नूपुर, चैन कहाँ पावै अनहद गुजरिया । धूप छाँव है कहुँ घेरे बदरिया ——–। दर्पण देखत शृंगार मनभाए । रंग पिया मोहे चटक हुलसाए । लौंग सुपारी के वीड़ा अधर ज्यों, यौवन की आई खड़ी दुपहरिया धूप छाँव है कहुँ घेरे बदरिया —–। ———-डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    “पावस झरे”

    #गीत बरखा सावन भाये प्रियतम साँसों को महका रही । लगा डिठौना कारी बदरी पग घूँघर ठुमका रही । #गीत बढ़ी तृषा हिय हुलसित गाए, होनी हो अनहद भले । करें दिग्भ्रमित घाट-पाट ये, अनहोनी हर बार टले । मौसम की मनुहार करे मन कँगना जो खनका रही । जादू टोना काम न आये , मन मयूर छन-छन करे , शाख-शाख पर कूक सुहाए रिमझिम जब पावस झरे । नृत्य सुखद यह भाव-भंगिमा , सजनी कटि मटका रही ——— डॉ प्रेमलता त्रिपाठी

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