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मातृ-दिवस
‘सजल’ याद मुझे है अपना बचपन, श्वाँसें मेरी प्रतिपल गातीं। माँ की अनुपम अनगढ़ बातें, प्रथम गुरु बन राह दिखातीं।। मिला जनम ये श्रेय तुम्ही हो, उसका कोई मोल नहीं है। मूँद लिया ज्यों पलकें अपनी, माँ तुम ही धड़कन बन जातीं।। नहीं तृप्त हैं नयन हमारे, भूल सके कब हँसता शैशव। हृदय समायीं सुंदर छवियाँ, जब अतीत से मन बहलातीं।। मातु विधाता सम हितकारी, तेरा आँचल मेरा वैभव । काँधे माँ के झुके न हारे, करुणा-वारिधि प्यार लुटाती।। तुमको देखा अपने अंतस, बनी साधना अनुपम पथ ये। चंचल बयार निःशब्द डगर, मंदिर-मदिर मन को महकातीं।। माँ की लोरी प्रीति अनकही, छलके जब ममता के आँसू । भावों का उद्गम…
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आभार की कहानी।
गरिमामयी कहानी जीवंत सच लिखेगी ये लेखनी कहानी। आभार शब्द का है आभार की कहानी। शब्दों सहित तुम्हारी हित भाव व्यंजना को माना सुहासिनी हो गरिमामयी कहानी। तन-मन सँवार देती ये मौन अर्चना से, वाणी उजास भरती संसार की कहानी। सबको गले लगाया अभिनीत कर दिखाया, संवाद की पुजारन संगीत सी कहानी। कंचन बरन समाहित इसकी सजग है लीला, स्याही कमाल करती उपजी सही कहानी। आँसू भले बहाती है मान लोचनों की, असहाय की दशा में रोती रही कहानी। संभावना लिए जो इतिहास बांँचती है, कहती ‘लता’ समेकित शिक्षा भरी कहानी। डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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“निराशा हो जगत से दूर”
आधार छंद विधाता….. दिया प्रभु ने बहुत हमको उसे अर्पण करेंगे हम। उठो जीवंत साधक मन शोध चिंतन करेंगे हम। निराशा हो जगत से दूर सार्थक राह अपनाकर। जगा विश्वास तन-मन लोक का रंजन करेंगे हम। विवश करती रही तृष्णा खिलौना बन गया मानव। उठाया अब कदम हमने,सजग मंथन करेंगे हम । विवादों से घिरा जीवन न जीना है गवारा अब! बढ़े जागृति मनोबल भी, नहीं क्रंदन करेंगे हम। रखेगी-लेखिनी पावन धरा की मान मर्यादा! बहाकर काव्य की धारा सही मंचन करेंगे हम। बहुत खोया न खोना कुछ मिटा भ्रम को बढ़ें आगे सजा नगमें विधाता के अधर सावन करेंगे हम । लता संगिनि बनेगी नित्य कोमल मन नहीं हारे।…
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“आशा की अभिलाषा पूरी”
*स्वर की देवी आशा भोंसले* #श्रद्धांजलि: स्वर-अमरता को समर्पित #गीत छोड़ जगत को जाने वाली, गुंजित स्वर संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। प्यार भरे वे सुर अब गूँजे, अधर-अधर मुस्कान। श्वासों ने बन्धन तोड़े सब, स्मृतियांँ हुई महान। राग-रागिनी रजनीगंधा, अलख जगाती प्रीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। अगन लगाती शरद कौमुदी, विरहन के हिय द्वंद। अश्रु थिरे कोरों से टप-टप, लिखते अन्तिम छंद। बहे सुनामी उर-थल कंपित, मौन हुआ संगीत। आशा की अभिलाषा पूरी, सरगम भरती जीत। ’आशा’ कोकिल अमराई की, लेतीं अब विश्राम। विदा लिया केवल नश्वर ने, परम मुक्ति अभिराम। नमन तुम्हें हे! स्वर की देवी, भाव भरे मनमीत। आशा की अभिलाषा…
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“सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां”
#गीत सत्य-अहिंसा-सघन साधना,अश्रु नहीं प्रिय प्रणय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। संघर्ष बहुत थे पग-पग अपने, है अतीत की गहरी गाथा। काट तिमिर को जागृति आयी, मिली फतह से उन्नत माथा। सीख दिया है जिसने हमको, वृथा नहीं अब अनय चाहिए । जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। मयदानव सम खड़ी सामने, अट्टहास कर गईं वृत्तियां । बिगुल बजा पंचास्य नाद का, सफल हुईं कब द्वंद्व नीतियां । आज समर्पण की बेला में, धर्म-नीति का विलय चाहिए। जीवन को आरक्षित करना, अन्य न कोई विजय चाहिए। व्यर्थ गंवाकर जन-धन सपने, कुटिल नीति मुस्कानें भरती । बनी रुदाली सिसक रही है, अंक लिए…
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“प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं”
प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं #गीत टूट न जाना संघर्षों में,समय सही का साथ निभाना । शर्त यही कर्त्तव्य नेक हों,अनहोनी पर क्या पछताना । आशा पग-पग राह दिखाती । नींव-इमारत को बनवाती । एक एक कर सजें कँगूरे, मन ही मन निश्चित मुस्काती । सुख-दुख में दर्पण सम होना ,मुखर आइने से बतियाना । अनहोनी पर क्या पछताना ———–! भूली बिसरी गति श्वाँसों में । छिपी कामना अहसासों में । “प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं” व्यर्थ न करना उपहासों में कोमल सपने उर में जागें,बस मूल मंत्र सा हो जाना अनहोनी पर क्या पछताना ———–! पूर्ण करें हम कर्ज समय का। दृढ़ निश्चय हो मान अभय का । यहीं…
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“तुमुल युद्ध की परिणति”
सजल बंजर होती धरती देखें, हुई प्रकृति भी बाम । तुमुल युद्ध की परिणति देखें, कैसा यह संग्राम।। हिला विश्व का कोना-कोना, छिड़ी हुई मुठभेड़। कुटिल नीतियांँ बाज न आएं,नहीं साम औ दाम।। वैमनस्य आपद कारी यह, द्वैष बढ़ा मतभेद। देव-धरा का साथ निभाना, छोड़ो सारे काम।। शांति-दूत हम सत्य-सनातन, देख सके न जंग। मिलकर हम संकल्प उठाएं, जगती पर हो नाम।। मिट न सके चंदन की गरिमा, विषधर लिपटे अंग। बारूदी संघर्ष कटे अब , मिट जाए ये झाम ।। वैर-भाव की बातें ओछी, नेक हृदय निष्कर्ष । ईश प्रार्थना संकट काटें, मनके-मन के राम।। स्वप्न ‘लता’ के होंगे पूरे, घूमें देश विदेश । चढ़ा सकूँ पुष्पों की माला,…
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वन्देमातरम्
!!!वंदेमातरम् वंदेमातरम् वंदेमातरम् !!! सत्य सनातन अपनत्व भरा, प्यारा वंदे मातरम् । भूलें मत सदियों से अपना, नारा वंदे मातरम् ।। किरणों के रथ बैठ दिवाकर, प्राची से संदेश दे। लिए सबेरा कर्मठ बढ़ता, पारा वंदेमातरम् ।। सजी धरा जगमग जैसे, मुखर रागिनी गा रही । खोल पलक को सरस निहारे, तारा वंदे मातरम् ।। जय जवान से जय किसान तक, भाव-भरे अनुगूँज से। कदम-कदम पर ओज-बढ़ाए, न्यारा वंदे मातरम् ।। बिगुलबजा जो गलियारों में, राष्ट्रगीत हो पूर्ण अब, नहींं सियासी दाँवों से जो, हारा वंदे मातरम् ।। पहने वासंती चोला ज्यों, अखंड भूमि भारत ये। एक राष्ट्र हो तोड़े बंधन, कारा वंदे मातरम् ।। प्रेम-मंत्र विश्वास-अडिग यह, सत्साहस अधिकार…
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#दीपोत्सव विशेष ….
दीपोत्सव #विशेष ———————- जन्मभूमि भारत यह जिससे, अपना मधुमय नाता है। पर्वों का यह देश निराला, गीत मिलन के गाता है।। जहाँ अमावस को पूनम सम, जगमग दीप जलाते हम। लिखते हैं निस्वार्थ भाव से, निज सत्य बहीखाता है।। ढुल-मुल नीति वही ढोता है, भार रूप है जीवन को। अपनी जड़ता के कारण, व्यर्थ रीति दुहराता है।। सदा संतुलन संदेश रहा, स्वयं सँवारे नियति नियम। रवि ज्यों देता सजग चेतना, नाते मौन निभाता है।। भूख गरीबी या मंदी हो, चिंतन से बदलेगें हम। दीप ज्योति से विकट अँधेरा, उसे मिटाना आता है।। नयी योजना उम्मीदों से, भारत सुदृढ़ बनाने को। पहल सदा हम स्वयं करेंगे, यही वक्त सिखलाता है।। दीप-दिवाली…
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“दुहराता इतिहास उसी को”
*सजल* समय-समय पर बरखा सावन,और समय से आता पतझड़। नियति बांँचती भाग्य हमारे,सुख-दुख आते हैं उमड़-घुमड़ ।। चूनर दाग न धो पाएगी, हृदय हीन हो रिश्ता-नाता। प्रीति लगन यदि सच है बढ़ती, भले बनाते लोग बतंगड़।। लोक रीति से परे न कोई, नयी-पुरानी सीख समझ लें। सत्य-सनातन बिन कड़ियांँ सब, बिना शीश के लगतीं धड़।। भूले बिसरे गीत हमारे, नयी चेतना को समझाएं। दुहराता इतिहास उसी को, धाक उसी की जो है धाकड़।। महके फागुन में अमराई, कोकिल-काग करें हैं कलरव। मीठी-मीठी वाणी मनहर, झूलें हम डाली पकड़-पकड़।। बादल छौने नभ पर धाएं, काले-भूरे रार मचाएं। गरज उठी घनघोर नाद से, चपला-चमकी नभपर तड़-तड़।। सांँझ सुरमई निशा सुहागन, चातक-नयन हुए…






















