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“प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण”
अग्नि/पावक/आग #गीत समिधा जलती हवि के कारण, होता पुण्य प्रवाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। अग्नित्रयी की ऊर्जा पावन, सहज संतुलन सार । प्रथम जिसे ‘जठरानल’ कहते, पाचन का आधार। कहते द्वितीय ‘वाडवानल’ अथ,करते विज्ञ विमर्ष। उठते ज्वार,ज्वालामुखी का, रहस भरा उत्कर्ष। जलधि ताप को करे संतुलित,ऊर्जा लिए अथाह। जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह। पावक तृतीय ‘दावानल’ द्रुत, आदि जगत का खोज। भस्म करे जो स्वतः अरण्य को, घर्षण दाहक ओज। संत सुसंगत आवाहन से, यज्ञ धूम सत्कार्य। विमल शोध शोधन-शाला में, वेद-निहित आहार्य। प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण, उत्तम यह निर्वाह। जप-तप माला छाप-तिलक से, मिटे न अंतर दाह। दग्ध करे ईर्ष्या जनमानस, गढ़ती नित्य तिलस्म।…
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#गीत जीवन के हर पथ पर हम को,मिला सभी का प्यार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । चाहे सुख के दिन हो चाहे, हो अँधियारी रात । पीड़ा की सौगात कभी थी, खुशियों की बारात । इसी तरह मिलजुल कर हमने,स्वप्न किया साकार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । पग-पग आती बाधाओं में, साथ चले निर्बाध । थे अनजाने पथिक जहाँ हम, फिर भी स्नेह अगाध । निराकार साकार रूप में, मिला मुझे आधार । मैं नइया हूँ इस नइया के, प्रभु ही खेवन हार । विनती है मेरी बस इतनी, साथ न छूटे कंत । इस अटूट…
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“एक और सांँझ ढल गई”
#गीत सजी सुनहली यादें लेकर, इक सांँझ ढल गई। बात सुनाती हवा समय की, आगे निकल गई। मुस्कान लिए धीमी जैसे, ढलने सूर्य लगा। भीड़भाड़ से दूर, जहाँ तम- छलने हमें लगा। एक बात थी खामोशी में, सिमटी संँभल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। छाँव तले ऊँचे से नीचे। पथ की हरियाली। पगडंडी से उतर रही है, गहराती लाली। मौन-बीच सफेद फूलों से, मुलाक़ात उसकी। बीते कल के खुले झरोखे, सँवरी मचल गई। सजी सुनहली यादें लेकर, सांँझ इक ढल गई। जगमग में डूबे द्वार सभी, गूंगे बहरों की । सुविधाएं कितनी; आजादी, खोयी शहरों की । उन्मुक्त भाव से जीवन का, रहना निगल गई।…
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“संसृति की यह गोद”
संसार की सुंदरता ——————— #गीत लेकर आयीं सुधियांँ अपनी, प्रेम भरा आधार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। बीते पल को कौन भुलाए, अनहोनी बेमेल । कुछ छूटे कुछ छोड़ चले सब, संबंधों का खेल। वर्ष-वर्ष की बात और क्या, मिल बैठै दो चार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। धरा-गगन के मध्य समन्वय, जिसका ओर न छोर। सरस लुटाती प्रकृति संपदा, नाचे मन का मोर। आतीं-जातीं ऋतुएं देतीं, अनुपम अपना प्यार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार। नक्त-दिवस-आपाधापी में, संसृति की यह गोद। बचपन-यौवन-तरुणाई तक, भरता मन आमोद। अनहद नाद भरे सरगम ये, खोले हृद के द्वार। कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर…
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“स्वागत में सतरंगी आभा”
#होलीकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं! #गीत हाट-बाट सब रंग-बिरंगे,हरित-पीत नभतल अरुणाई। स्वागत में सतरंगी आभा,धूम-धाम से होली आई। छटा बिखेरे रंगों वाली, बालवृंद की अनुपम टोली। तन को-मन को चले भिगोने, भरकर वे खुशियों से झोली। मस्ती करते सखा सँगाती, पीकर नाचे ज्यों ठण्डाई। स्वागत में सतरंगी आभा, धूम-धाम से होली आई। धूप सलोनी आँगन परसे, प्रीति लगाए मन को भाए। खुले केश सजनी के लहरे, पवन निगोड़े रास रचाए। शीत चली मदमाती पीहर,गुनगुन गाती ज्यों फगुआई। स्वागत में सतरंगी आभा, धूम-धाम से होली आई। ढोल-थाप पर नाचे गाएं भंग घोलते जन हुरियारे। मुखर हुए ठण्डाई पीकर, झूम उठीं गलियांँ चौबारे। चंचरीक कलियों में अनबन,रंग देख दोड़ें भरमाई। स्वागत में सतरंगी…
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“कमनीय किलोल कलहंस के”
गीत निखर उठी सरसों पियराई। पुनि आए ऋतु कंत सखी री! प्रीतम प्यारी झूमें अंँगना। संँवरी धरा अनन्त सखी री! पहन प्रवासी पीत-पगड़िया,फाग उड़ाए रसिक बिहारी। भंग पिए ज्यों झूमें गाए,नगर ग्राम औ उपवन क्यारी। फर-फर उड़े श्वेत गंधकी,सुरभित करे दिगंत सखी री! निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री! कमनीय किलोल कलहंस के,प्रिया रसिक सह रास रचाए। खग की बतिया खग ही जाने, चपल चंचरी चंचु उठाए। भरमाए अनजान पथिक को,विवश हुए मन संत सखी री! निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री! कंचन वर्णी विमल रूपसी, रूप निहारे सजनी दर्पण। रश्मिरथी नित भुवन भास्कर,अंग समाए पिय सरस स्फुरण । शगुन सुनाए पिय की पाती,…
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शिशिर गए हेमंत
गीत शीत समायी अंग-अंग में, गर्म हुए बाजार। बाल-वृद्ध को अलग सताए, सुने नहीं दातार।। सन-सन चलती हवा कँपाए, ठिठुरन झेले पात । आर-पार की खड़ी लड़ाई, सहते सब संघात ।। धुंध धुँआरे पथ को घेरे, शीतल पड़े फुहार । शीत समायी अंग-अंग में, गर्म हुए बाजार।। रवि किरणें निस्तेज हो रहीं, शिशिर गए हेमंत । हाड़ कँपाती ठंड हठीली, भर दे भाव अनंत ।। प्रीति प्रतीति लगे अलाव सम, विरहन के उद्गार । शीत समायी अंग-अंग में, गर्म हुए बाजार।। पत्र-पत्र पर मुक्ता बनकर, बिछी ओस की बूंद । पंखों की हलचल में सोई चुनमुन आँखे मूंद ।। छिपे लगे शाखों में छौने, प्यारा यह संसार। शीत समायी अंग-अंग…
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“विविध रंग की सजी काँवरी”
#गीत प्रतिपल सुख-दुख उलझन अपने,सुलझे नितअनुपात रहे। सुयोग-वियोग मिल-जुल अपने,प्रात सुखद हर रात रहे। ** करुण हृदय हो सहज वेदना, थाती ये अनमोल जहाँ। नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल यहाँ। खोना मत अवसर को साथी, चाहे जो हालात रहे। प्रतिपल सुख-दुख उलझन अपने,सुलझे नित अनुपात रहे। ** शतरंजी बाजी यह जीवन, हार जीत का है खेला। नियति कठोर सरल तो निश्चित अभिनय का नित्य झमेला। अगणित रूप धरे हम प्यादे, व्यर्थ नहीं अपघात रहे। प्रतिपल सुख-दुख उलझन अपने,सुलझे नित अनुपात रहे। ** विविध रंग की सजी काँवरी, नेह भरे हम व्योम अदृश । सहज लगे दिन रैन सबेरा, मात-पिता के प्रेम सदृश । “लता” सघन उम्मीद…
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धर्म-ध्वजा
जय हिन्द जय भारत ———————– देश हमारा धरती अपनी, नवल प्रभात सुहाए । राम अवध से अवध राममय,धर्म-ध्वजा फहराए। सूर्य पताका सरगम साधे, केसरिया का वंदन । कल-कल बहती गंगा-यमुना, करती है अभिनन्दन । सोन-चिरैया जग में मंडित, आभा नित फैलाए । राम अवध से अवध राममय,धर्म-ध्वजा फहराए। अंतस जोड़े हिन्दी भाषा, धर्म-भूमि ये अवनी । विजय पताका लेकर गाती, वीरों की ये जननी । रहे सुशासन सत्य सनातन,संस्कृति साथ निभाए। राम अवध से अवध राममय, धर्म – ध्वजा फहराए। मीठी-कड़वी सच्चाई को, मिलकर हम अपनाते । जाति-पांँत के झूठे बंधन, अलग नहीं कर पाते । राजनीति में उलझे जन को, सच्ची राह दिखाए। राम अवध से अवध राममय, धर्म-ध्वजा…
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“हाथ मले क्यों रिक्त”
#गीत दूर करें हम सभी रिक्तियाँ, दृढ़मति कर विश्वास। मन के मनके की माला में, पिरो दिया यदि आस। भरा हुआ या खाली आधा, अपनी अपनी दृष्टि। ऊसर-बंजर भरें निराशा, भर देती तब वृष्टि। सजग कर्म-पथ करना होगा, नित्य नवल विन्यास। मन के मनके की माला में, पिरो दिया यदि आस। समय नहीं रुकता है नियमित, नियति साधना सिक्त। खो देते हैं अवसर कितने, हाथ मले क्यों रिक्त। श्रम-सीकर को बहना होगा, कर्मठ तजें विलास। मन के मनके की माला में, पिरो दिया यदि आस। मनुज-मनुजता से अनुबंधित, प्रेम झरोखे खोल। धैर्य-धर्म से कटे आपदा, जीवन है अनमोल। पुण्य प्रसून सँवरना होगा, मत कर उसे उदास। मन के मनके की…


























