• #गीत

    “मन-मयूर मुस्काए”

    -गीत——————- उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। उड़ते पाखी दल से खेले पवन बावरा चंचल। सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी। गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी। इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए । पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा , भीगा मन्मथ डोले। कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले। आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए । पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। *********************डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • गीतिका

    “समय हमारा दास नहीं”

    “सजल गीतिकाव्य” °°°°°°°°°°°°° चिंतन-मंथन-अभ्यास नहीं। यह समय हमारा दास नहीं।। कथनी-करनी में भेद न हो। है लक्ष्य-भेद परिहास नहीं।। क्या बैठ किनारे सोच रहे? इससे बुझती बस प्यास नहीं।। फिरते ठग हैं साधु-वेश में। केवल भगवा संन्यास नहीं।। अवशेष सुधारें जीवन का। क्या;मृत्यु खड़ी है पासनहीं?? चुनकर गंतव्य चले थे हम। सौदा सच्चा आभास नहीं।। ‘लता’लगी है चिंता मुझको। टूटे मन का विश्वास नहीं।। डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

  • #गीत

    जन्माष्टमी 2026

    योगिराज श्रीकृष्ण के विराट रूप को नमन ! #गीत अधर बाँसुरी निर्विकार मन, सरल गांभीर्य अपार। शांत चित्त,वे स्थिर प्रज्ञ का, दिव्य दिखा अवतार। पार्थ मोह के घन कानन में, उदेति गीता सूर्य । अस्त्र,-शस्त्र के बिना समर में, चमके बन वैदूर्य। युद्धभूमि के सिद्ध सारथी , महायोग के द्वार। राधा-प्रेमी, मीरा-दर्पण, सखा-सुदामा सेतु। काल कंस का धर्म रक्षक, फहराया था केतु। योगीश्वर लीलाधर करते, संकट का संंहार । वन-वन डोले वैरागी तन, भव बंधन से दूर। वश में करते नयन भृकुटि से, मंत्र सिद्ध कर्पूर। माखनचोर कहें गोकुल के, श्यामल नंद कुमार। “योगिराज” तुम वही कृष्ण हो,घट-घट पाया दीप्य। हर लीला में रहकर जिससे, अर्थ सहित सामीप्य। समदर्शी प्रभु…

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