गीतिका

“कल्प रहे कल्पांत नहीं”

#गीत
मधुरस भीनी बगिया ये, कल्प रहे कल्पांत नहीं ।
सुखदा संसृति अपनी प्रतिपल,करती जो दिग्भ्रांत नहीं ।
***
सरस लगे ये दिगदिगंत
देखन वाले नैन अलग ।
लोभी मधुकर से यदि पूछें,
गुनगुन करते बैन अलग ।
खोकर जीवै वही साधना , इसके कुछ उपरांत नहीं ।
सुखदा संसृति अपनी प्रतिपल,करती जो दिग्भ्रांत नहीं ।
***
नित्य रचे जो द्वार रँगोली,
स्वागत में चौखट हो ।
कुम कुम हल्दी अक्षत ले
हँसकर खुलता जो पट हो ।
तुलसी के बिरवा ! चुनमुन से,अँगना चहके शांत नहीं
सुखदा संसृति अपनी प्रतिपल,करती जो दिग्भ्रांत नहीं ।
***
छंद रचे नव-नव विधान से,
गीत नेक रचना हमको ।
छुपे दिव्य मन भाव सरसता,
मंत्र शुद्ध कहना हमको ।
अनहद ये उपधान हमारे,तुक साधें अतुकांत नहीं ।
सुखदा संसृति अपनी प्रतिपल,करती जो दिग्भ्रांत नहीं ।
***************डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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