गीतिका

बंसरी श्याम की

गीतिका- आधार छंद – दोहा

मुरली माखन चोर की,राधे लीन्ही छोर ।
डाह रही सौतन बनी,लिए फिरें निशि भोर ।।

बिसरें नाहीं वाहि को,यशुमति तेरे लाल ,
हाथ कँगन क्या आरसी, देखें नैना मोर ।

मोहन को भरमाय के,धेनु चरावें दूर ,
भूल गये माखन मधुर,मेरे नंद किशोर ।

बंसरि कस बैरन भई,श्याम हमारे बीच ,
प्रीति हमारी मोल ले,छीन रही चितचोर ।

प्रेम नयन न झपकि रहें,ठान करें अब रार,
गोपिन संग रास करत,मुरली करत विभोर ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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