गीतिका

उम्र दे पड़ाव नहीं

आधार-छंद : घनाक्षरी वर्णिक छंद – 16 यति 15 अंत में लघु-दीर्घ अर्थात 12

समान्त- अरने <> पदान्त – लगे
गीतिका ——-

उम्र दे पड़ाव नहीं,धूप शीत छाँव सही,
दंभ मन विकार से, संत डरने लगे ।

पल एक मीत बनें,जीत यश गान घने,
दीर्घ नहीं आयु भली, जो अखरने लगे ।

पुण्य प्रसून हो खिले,मधुप गान से सजे,
सुषमा से छविमान, राग भरने लगे ।

यौवन अनमोल हों,आरक्त से कपोल हों,
प्रीति पथ सँवार लें,ज्यों मुकरने लगे ।

चला मकरंद बान,मूक से बने अजान,
रूप राशि के वितान,चित्त हरने लगे ।

नैन जल पखारते, विषाद मन वारते,
जीवन सुहास देख, खं ठहरने लगे ।

कंटकों से हार नहीं,निष्ठुर कर्तार नहीं,
अंत है अनंत नहीं , पीर मरने लगे ।

विभव कल्पना करो,बीज बुरे मत भरो,
प्रेम जगत सार क्यों, द्वंद्व करने लगे ।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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