गीतिका

अहसास है होली

गीतिका —-
सजाता फागुन का यह मास है होली ।
जगाये मधुर मिलन अहसास है होली ।

सारा रा रा रा ,रा जोगीड़ा झूमें,
रंग रंगीला रास विलास है होली ।

भौंरे डोले सुध बुध भूले मतवाले,
कली कली पर मुखर नव हास है होली ।

डूब रहा तन मन होकर सतरंगी ,
बिखेरे वासंती उल्लास है होली

हो चढ़ा भंग सब अंग तरंगित जैसे,
प्रेम सबै बनाये मन दास है होली ।
डॉ प्रेमलता त्रिपाठी

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