“मन-मयूर मुस्काए”
-गीत——————-
उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।
सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक,
ऊर्वर करती अंचल।
उड़ते पाखी दल से खेले
पवन बावरा चंचल।
सूखे तरुवर हरित शाख से,
करतल ताल-बजाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।
बिजुरी कौंधी रेखांकित से,
जगमग धरती रानी।
गीत प्रीत के गाती जाए,
ओढ़े चूनर धानी।
इन्द्रधनुष की आभा लेकर,
किरणों के दल आए ।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।
सुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा ,
भीगा मन्मथ डोले।
कली गली में गुंजित सरगम,
मधुकर मदिरा घोले।
आशाओं का मधुबन फिर से,
अनहद प्यास-बुझाए ।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।
*********************डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


