सुभाषिणी हिन्दी (छंद पारिजात)
मुक्तक
रीत सावन सरस निभाऊँ मैं।
मीत कान्हा तुम्हें रिझाऊँ मैं।
नैन ढूँढे सखा सुहाने दिन,
संग झूलूँ तुम्हें झुलाऊँ मैं।
धुंध नीरस नहीं बसेरा हो।
कर उजाले जहाँ अँधेरा हो।
आपसी द्वंद्व को बढ़ाना क्यों,
नित्य सर्जन लिए सवेरा हो।
सत्य सरला सुभाषिणी हिन्दी।
भव्य अपनी स्वरागिनी हिन्दी।
देव वाणी मधुर पुनीता तू,
वेद छंदानुगामिनी हिन्दी।
दीप संध्या सनेह हो बाती।
अर्चना भी सप्रेम हो गाती।
कर्मणा शुद्ध हो मधुर पथ जो,
साधना भी अजेय हो जाती।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


