“सरल-विरल अनुरागी मन”
गूंँज उठी अमराई जैसे, कोकिल रव ने गीत लिखा ।
अनजानी राहों पर चलते, मिलते ज्यों मन मीत लिखा ।
उड़ी तितलिका रंग बिरंगी, झूम उठी क्यारी-क्यारी,
देख निराली सुन्दरता को,मन हो आशातीत लिखा ।
रस के लोलुप भ्रमर वृंद भी, बड़े सयाने लगते हैं,
क्रीड़ा करते मनुहारी पर, कलियों का मन भीत लिखा।
मेघ मल्हार की सरगम पर,दिया निमंत्रण बरखा को,
शुष्क धरा का फैला आँचल, खुशियों ने संगीत लिखा!
लता नहाई रिमझिम बूंदन,गागर से सागर सरसे,
बही प्रेम की धारा निर्मल, किंचित हार न जीत लिखा!
पार लगाओ भव बंधन से, मुक्त करो मिथ्या जग से,
कुछ अनहोनी हो न सके, संशय ने विपरीत लिखा।
‘लता’प्रेम की बढ़ती जाए, पीर सभी की समझे जो,
सरल-विरल अनुरागी मन से, भाव अनंत पुनीत लिखा।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी