“प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण”
अग्नि/पावक/आग
#गीत
समिधा जलती हवि के कारण, होता पुण्य प्रवाह।
जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह।
अग्नित्रयी की ऊर्जा पावन, सहज संतुलन सार ।
प्रथम जिसे ‘जठरानल’ कहते, पाचन का आधार।
कहते द्वितीय ‘वाडवानल’ अथ,करते विज्ञ विमर्ष।
उठते ज्वार,ज्वालामुखी का, रहस भरा उत्कर्ष।
जलधि ताप को करे संतुलित,ऊर्जा लिए अथाह।
जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह।
पावक तृतीय ‘दावानल’ द्रुत, आदि जगत का खोज।
भस्म करे जो स्वतः अरण्य को, घर्षण दाहक ओज।
संत सुसंगत आवाहन से, यज्ञ धूम सत्कार्य।
विमल शोध शोधन-शाला में, वेद-निहित आहार्य।
प्रकृति प्रबंधन सजग नियंत्रण, उत्तम यह निर्वाह।
जप-तप माला छाप-तिलक से, मिटे न अंतर दाह।
दग्ध करे ईर्ष्या जनमानस, गढ़ती नित्य तिलस्म।
काम-क्रोध की अग्नि विकट है,पल में करती भस्म।
तिनका भर चिंगारी दाहे, कोटिक भवन विलास।
क्षण-विनाश की लीला हरती, भर देती संत्रास।
भौतिक जग में विध्वंसक ये, ध्वस्त करे उत्साह।
जप-तप माला छाप-तिलक से,मिटे न अंतर दाह।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


