कृषि प्रधान यह देश।
सत्य सनातन अपनत्व भरा, ग्राम-नगर उन्मेष ।
किरणों के रथ बैठ दिवाकर, प्राच्य लिए संदेश ।
भूलें मत सदियों से अपनी, संस्कृति का उदघोष,
जय जवान से जय किसान तक, भाव-भरे परिवेश।
चोला पहने नित वासंती, अखंड भारत भूमि, ।
लिए सबेरा कर्मठ बढ़ता, कृषि प्रधान यह देश।
सजी धरा हो हरियाली से, लगे मोहिनी रूप
चूनर धानी हरी बालियां, देख मिटे मन क्लेश।
सुजलां सुफलां शस्य श्यामलां, राष्ट्रगीत हो पूर्ण,
एक राष्ट्र हो अखण्ड भारत, लक्ष्य सिद्ध आदेश।
कदम-कदम पर ओज-बढ़ाए,सत्साहस समवेत
अ़द्भुत अविरल अभिन्न अर्णव, जागरूक अनिमेष ।
खेतों से खलिहानों तक, गर्वित रहे किसान,
‘लता’ प्रेम की शाख बढ़े नित, क्षीण न हो लवलेश।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
