‘मलमास’
——– सजल
भोर जगे नित शंखनाद से, साँझ भजन शिवशंकर।
गूँज उठे ‘मलमास’ दिवस ये,ज्योति जले अभ्यंतर।।
स्वत: सिद्ध ये अतल-वितल में, सिद्धांतों की गरिमा।
वश में करना इंद्रिय-निग्रह, चाह नहीं गिरि-कंदर।।
पीसन वाली प्रियतम प्यारी, संयम गीत सुनाए।
चलती चकरी घूम रही प्रभु, लेकर माया अंतर।।
बांँध रहे निज ध्येय-प्रेय को, दो पाटों के संयम।
सकल मनोरथ पूर्ण करें जो,पीर समेटे अन्दर।।
ताल नियंत्रित जीवन दर्शन,अर्पित तन अविकारी।
जीवन सच की यह परछाईं, मध्य धरा से अंबर।।
लता-प्रेम की बढ़ती जाए, भाव-भूमि बटछाया।
अभिमंत्रित यह कर्म-योगिनी,संसृति सत्य स्वयंवर।।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी


