“संसृति की यह गोद”
संसार की सुंदरता
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#गीत
लेकर आयीं सुधियांँ अपनी, प्रेम भरा आधार।
कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार।
बीते पल को कौन भुलाए, अनहोनी बेमेल ।
कुछ छूटे कुछ छोड़ चले सब, संबंधों का खेल।
वर्ष-वर्ष की बात और क्या, मिल बैठै दो चार।
कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार।
धरा-गगन के मध्य समन्वय, जिसका ओर न छोर।
सरस लुटाती प्रकृति संपदा, नाचे मन का मोर।
आतीं-जातीं ऋतुएं देतीं, अनुपम अपना प्यार।
कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार।
नक्त-दिवस-आपाधापी में, संसृति की यह गोद।
बचपन-यौवन-तरुणाई तक, भरता मन आमोद।
अनहद नाद भरे सरगम ये, खोले हृद के द्वार।
कभी न हारे संघर्षों से, सुंदर यह संसार।
————– – डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


