गीतिका

पावस “गीत”

#गीत ( छंद-सार)

बरस उठी कजरारी बदरी,सुभग सलोनी अँगना।
बाट निहारे साँझ सकारे, बैठि झरोखे सजना ।
सरस मधुर दिन रैन सताये,
संग सखा बिन झूले ।
रास न आवे मगन समीरण ,
हौले मन को छूले ।
देख सखी छवि वारी जाये,श्याम पिया के रचना ।
बरस उठी कजरारी बदरी,सुभग सलोनी अँगना ।
बिजुरी विरहन तड़प उठी जब,
नैना दो चमकाये ।
लगे साँवरी अंग तरंगित,
सुंदर कटि बलखाये ।
गगन खींचती रेख समाये, पल में जैसे सपना ।
बरस उठी कजरारी बदरी,सुभग सलोनी अँगना ।
कठिन लगे यों जलबिन जीवन,
नभ-थल तनिक न भाये ।
गौर वर्ण से कारी होकर,
केश घना लहराये ।
लता प्रेम की श्याम पिया से,उलझे जैसे नयना ।
बरस उठी कजरारी बदरी,सुभग सलोनी अँगना ।
———————डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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