गीतिका

“अनचाहे कुछ अनुबंधन”

#गीत
सागर सम्मत रत्न समेटे,मन में भी गहराई है ।
अनदेखी अपनों से होती,रोती तब तनहाई है।
मृगमरीचिका जीव बढा़ए,
अर्थ सहित करिए मंथन ।
जोगन काया भोग रही है,
अनचाहे कुछ अनुबंधन ।
साँस हिया में हलचल करती,चार दिवस पहुनाई है ।
अनदेखी अपनों से होती,रोती तब तनहाई है ।
रिश्ते जोडे़ नये पुराने ,
नहीं लगे पलछिन दिलकश ।
साथ चले कब चंद कदम ये,
उलझन करती है परवश।
लगा कहकहे हँसती मद में,कैसी ये तरुणाई।
अनदेखी अपनों से होती,रोती तब तनहाई है।
दर्द दिलों की बाँट सकेंगे,
समय कसौटी पर तुलकर ।
रंगों की विविधा है जीवन
जीते हैं हम जब घुलकर ।
“लता” प्रेम की खिले साथियों,महके ये पुरवाई है
अनदेखी अपनों से होती,रोती तब तनहाई है ।
**********डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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