गीतिका

सागर विशाल

आधार छंद- तारासरालगा
मापनी – 221 2121 1221 212
समान्त- आती <> पदान्त -रही मुझे

गीतिका —

सागर विशाल उर्मि सुहाती रही मुझे ।
लहरें उछाल संग रिझाती रही मुझे ।

करती रही विभोर सलोनी सुबह सदा,
पावस सरस बयार जगाती रही मुझे ।

है अस्त या उदीय धरा संग हो गगन,
रवि लालिमा सुहास लुभाती रही मुझे ।

संघर्ष में विवेक हताशा मिटा हृदय,
राहें वहीं अनेक बुलाती रही मुझे ।

हो लक्ष्य यदि विकास नियामक सही मिले,
परिणाम वह सदैव दिखाती रही मुझे।

जीवंत हो सप्रेम लुटाकर मिले खुशी,
कटुता करे विनाश बताती रही मुझे ।

डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Powered By Indic IME