गीतिका

रंगों की विविधा है जीवन

आधार छंद – लावणी
मात्रा = 30 – 16,14 पर यति
समांत – आने पदांत – से
गीतिका ——
रंगों की विविधा है जीवन, सजते ये अपनाने से ।
छाप छोड़ता कर्म हमारा, अपने रंग जमाने से ।

जहाँ तहाँ बिखरीं हैं खुशियाँ,ढूँढ उन्हें फिर लाना है,
जब तब मौके मिलते हमको,मिलकर कदम बढ़ाने से ।

पलक झपकते बीत रहा पल,आओ उन्हें सँवारे हम,
कम क्यों आँके क्षमताओं को,,बात बने समझाने से ।

दूर विजन कानन भी बोले,चटक चिरैया चुन मुन सी,
सूरज अपने पाहुन लगते, सपने नैन जगाने से ।

जीवन एक खिलौना जिसमें,चाभी भरना प्रतिपल है,
समता लायें सुख दुख में हम,हँसकर उसे बिताने से ।

रात सितारे झिलमिल गाते,गुंजित करना साँसों को,
दूर करें हम धुँध घुटन को,मन की मैल हटाने से ।

प्रेम नजरिया अपना है यह,दर्द सभी के मिट जायें,
शूल फूल सम बन जायेंगे, बढ़कर गले लगाने से ।

डॉ प्रेमलता त्रिपाठी

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