गीतिका

तम की शिलाएँ

गीतिका —
गहन तम की शिलाएँ तोड़कर मुझको गिरानी है ।
हमेशा रश्मियाँ आयें वही तो भोर लानी है ।

किरण के रंग बादल पर उकेरूँगी सदा अभिनव
खिलेंगे फूल राहों में लिए नूतन कहानी है ।

मिटेगें खार क्रंदन भी,समय की अटपटी चालें
भले हो दूर मंजिल भी नयी राहें बनानी है ।

दिया तल में अँधेरा हो सदा यह मान बैठे हम,
कथा आँसू कहेंगे यह कहानी बेजुबानी है।

विवशता में जिया करते छलें क्यों श्वांस अपनों की,
रुलाया है बहुत तुमने दुखों की अब रवानी है ।

ऋचाएँ प्रेम की कब तक रहेंगी सुप्त तन मन में,
उजाले गीत बनते जो वही कविता सुनानी है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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