गीतिका

जीवन

गीतिका
आधारछंद – राधेश्यामी16,16 पर यति
समांत – आना, पदांत – है ।

जीवन है काँटों का झुरमुट, क्या उलझ हमें रह जाना है।
पथ के सारे काँटे चुनचुन, उसको अब सुगम बनाना है।

कैसी मन की कटुता भाई, क्यों मन भेद धरें आपस में ।
इक दिन जाना ही है सबको,अपनों का मिला खजाना है ।

है सात सुरों का सरगम जो,संगम ये सुर लय तालों का ।
तार हृदय के जोड़ रहे हम, कविता तो एक बहाना है ।

छ: ऋतुओं का अपना वैभव,सरस बनाते जन जीवन को।
रखकर वाणी सरस कोकिला, भावों कोे नित्य सजाना है।

उपवन में जब सुमन खिलेंगे,मन मयूर लेगा अँगड़ाई।
घन देख पपीहा पिउ बोले, सावन मनभावन आना है।

बेटी को कहें पराई क्यों, यह नहीं​ पराया धन भाई ।
हो जिनसे श्वासों का नाता, प्रिय बंधन गले लगाना है।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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