गीतिका

हमकदम

छंद- आनन्द वर्धक
मापनी- 2122 , 2122 , 212
समान्त -आना, पदांत- आ गया
गीतिका —
याद कोई जब तराना आ गया ।
गीत अधरों पर पुराना आ गया ।

गुनगुनाती शाम यों ढलती गयी,
याद बीता वह जमाना आ गया।

कौन जाने हम कहाँ तुम हो कहाँ,
व्यर्थ यादों को भुलाना आ गया ।

स्वप्न हों दुस्वप्न क्यों सत्कर्म से,
भाग्य अपना है जगाना आ गया ।

सज्ज होकर हम चलें दुविधा नहीं,
दृढ़ हृदय संकल्प पाना आ गया ।

मार्ग बाधा हों विरोधी ताकतें,
हमकदम पग को बढ़ाना आ गया ।

दर्प की बातें सुहाती हैं नहीं,
प्रेम मधुरस में भिगाना आ गया ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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