“मौन हुई अमराई”
गीतिकाव्य
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कौन सँदेशा लाए आली, कागा बिना मुंँडेर।
मौन हुई अमराई मानो, अमवा झरे न बेर।।
सूखी ताल-तलइया पनघट, प्रखर सूर्य के ताप।
सूनी गागर लेकर प्यारी, बोली आँख तरेर।।
प्यासे घूमे दीन बटोही, तरुतल मिले न छाँव।
श्वेत-श्याम घन भरदो आकर,अक्षय पात्र सुमेर।।
व्योम चढ़ा जो दंभ दिखाता, घन-घमंड दूँ तोड़।
खेल रहा क्यों निपट अनाड़ी, तीतर-लड़ा बटेर।।
मोर-पपीहा खगकुल,दादुर, झींगुर की अनुगूँज।
बूँद-बूँद सरसाए बरखा, बदरी छाए घेर ।।
लता-प्रेम की सींचें माली,अंक खिले जलजात।
हरित धरा पर प्रेमिल धारा, बरसे लगा न देर।।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी