“कमनीय किलोल कलहंस के”
गीत
निखर उठी सरसों पियराई।
पुनि आए ऋतु कंत सखी री!
प्रीतम प्यारी झूमें अंँगना।
संँवरी धरा अनन्त सखी री!
पहन प्रवासी पीत-पगड़िया,फाग उड़ाए रसिक बिहारी।
भंग पिए ज्यों झूमें गाए,नगर ग्राम औ उपवन क्यारी।
फर-फर उड़े श्वेत गंधकी,सुरभित करे दिगंत सखी री!
निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री!
कमनीय किलोल कलहंस के,प्रिया रसिक सह रास रचाए।
खग की बतिया खग ही जाने, चपल चंचरी चंचु उठाए।
भरमाए अनजान पथिक को,विवश हुए मन संत सखी री!
निखर उठी सरसों पियराई,पुनि आए ऋतु कंत सखी री!
कंचन वर्णी विमल रूपसी, रूप निहारे सजनी दर्पण।
रश्मिरथी नित भुवन भास्कर,अंग समाए पिय सरस स्फुरण ।
शगुन सुनाए पिय की पाती, कोकिल बान बसंत सखी री!
निखर उठी सरसों पियराई, पुनि आए ऋतु कंत सखी री!
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी —————————————–
गंधकी = (विशेषण) गंधक के रंग का हल्का पीला।


