मातृ-दिवस
‘सजल’
याद मुझे है अपना बचपन, श्वाँसें मेरी प्रतिपल गातीं।
माँ की अनुपम अनगढ़ बातें, प्रथम गुरु बन राह दिखातीं।।
मिला जनम ये श्रेय तुम्ही हो, उसका कोई मोल नहीं है।
मूँद लिया ज्यों पलकें अपनी, माँ तुम ही धड़कन बन जातीं।।
नहीं तृप्त हैं नयन हमारे, भूल सके कब हँसता शैशव।
हृदय समायीं सुंदर छवियाँ, जब अतीत से मन बहलातीं।।
मातु विधाता सम हितकारी, तेरा आँचल मेरा वैभव ।
काँधे माँ के झुके न हारे, करुणा-वारिधि प्यार लुटाती।।
तुमको देखा अपने अंतस, बनी साधना अनुपम पथ ये।
चंचल बयार निःशब्द डगर, मंदिर-मदिर मन को महकातीं।।
माँ की लोरी प्रीति अनकही, छलके जब ममता के आँसू ।
भावों का उद्गम अविकारी, स्नेह-विकलता में सन जातीं।।
बनी “लता” नित छाया तेरी, बढ़ता साहस-जीवन रथ ये ।
रोम-रोम में बसी मृदुलता धूप-छाँव बन पथ बिखरातीं ।।
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डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
संस्कृत साहित्याचार्य


