“निराशा हो जगत से दूर”
आधार छंद विधाता…..
दिया प्रभु ने बहुत हमको उसे अर्पण करेंगे हम।
उठो जीवंत साधक मन शोध चिंतन करेंगे हम।
निराशा हो जगत से दूर सार्थक राह अपनाकर।
जगा विश्वास तन-मन लोक का रंजन करेंगे हम।
विवश करती रही तृष्णा खिलौना बन गया मानव।
उठाया अब कदम हमने,सजग मंथन करेंगे हम ।
विवादों से घिरा जीवन न जीना है गवारा अब!
बढ़े जागृति मनोबल भी, नहीं क्रंदन करेंगे हम।
रखेगी-लेखिनी पावन धरा की मान मर्यादा!
बहाकर काव्य की धारा सही मंचन करेंगे हम।
बहुत खोया न खोना कुछ मिटा भ्रम को बढ़ें आगे
सजा नगमें विधाता के अधर सावन करेंगे हम ।
लता संगिनि बनेगी नित्य कोमल मन नहीं हारे।
चलाकर सत्य का अभियान परिवर्तन करेंगे हम।
————————-डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी


