गीतिका

कजरी

#गीत (कजरी
)
सखी महक उठी ज्यों माटी तलाई में,
चलो अगुआई में धान की रोपाई में ना —
धान की रोपाई में ना —
बहे पुरवा बयार चहुँ सावनी फुहार,
भीगे अँचरा हमार तनी छतरी सँभार ।
कहे कँगन कलाई में —
धान की रोपाई में ना —
बीज बेरन बनाय, देत पाँतन बिछाय,
धानी चूनर सुहाय,मन मन ही लुभाय ।
लागी गुइयाँ निराई में –
धान की रोपाई में ना —
कुहुक कोयली बान लगे सरस निदान,
देश हित में जवान,पिया सजग किसान ।
औ परदेसी कमाई में
धान की रोपाई में ना —
————————-डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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