गीतिका

कड़ियाँ मीठी-खट्टी ।

आधार छंद- “विष्णुपद” (मापनीमुक्त मात्रिक)
विधान- 26 मात्रा, 16-10 पर यति, अंत में वाचिक गा.
विष्णुपद = चौपाई + 10 मात्रा (समकल)
समांत _ अर <> पदांत _ गयीं
गीतिका —
पलकों में जैसे यादों की,मुक्ता ठहर गयीं ।
कड़ियाँ मीठी-खट्टी जिनकी,जाने किधर गयीं ।

नित अनजाने भय में अपने,दिन औ रैन किया,
ईश तुम्हारी नगरी सगरी, कैसी बिखर गयीं ।

जिन अपनों को खोया हमने,कोई लौटा दे,
पलतीं अवसादों की धारा,छलकीं-लहर गयीं ।

जीवन की आपा धापी में,किस्से हैं अनगिन,
दोषी ये दुनिया या खुद की,कमियाँ सुधर गयीं ।

कर असीम काँटों का संचय,तथ्य गया-गुज़रा,
ठहर गया हो सावन या के,बरखा गुजर गयीं ।

संबल प्रेम ; न हमदर्दी हो,यदि आस न टूटे ,
संघर्षों में गये रात-दिन,कहती उमर गयीं ।
—————–डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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