गीतिका

माँ शारदे को नमन

छंद- विधाता
मापनी – 1222,1222,1222,1222
समांत – आओ, पदांत – तुम
माँ शारदे को नमन —–
हृदय कोमल तुम्हारा माँ सदा करुणा बहाओ तुम।
जगे कुछ भाव नूतन अब,सरस वीणा सुनाओ तुम।

नहीं पीड़ा सही जाती,मचा है द्वंद्व अपनों में,
सुपथ पर हम चलें मिलकर,नहीं मतभेद लाओ तुम।

बढ़ी आशा बजट से जो,हृदय मंथन सभी के है।
कहीं खेती,युवाओं की,दुराशा को मिटाओ तुम ।

नहीं हो दीन अब कोई,मिले अधिकार सब को ही,
बड़ी चिंताजनक होती,गरीबी दूर हटाओ तुम ।

चलन कुछ इस तरह बदलो,सभी दुर्भाव मिट जाये,
उदासी सब नयन से चुन,फलक सुंदर सजाओ तुम ।

नहीं है डूबती आशा,भले मँझधार हो नौका,
यही हो कामना अपनी,सतत दृढ़ता बढ़ाओ तुम।

कलम के हम धनी होंगे,सृजन नि:स्वार्थ हो अपना,
कहेंगे सत्य जो होगा,यही बीड़ा उठाओ तुम ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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