गीतिका

70वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई

शीर्षक  ---सफर/ यात्रा / भ्रमण 
गीतिका ---
छंद -- भुजंग प्रयात (वाचिक)
मापनी  --122 122 122 122
समांत - आता, पदांत - बहुत है  

सफर हो अकेला सताता बहुत है । 
तनिक फासले को दिखाता बहुत है। 

कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले  जो, 
जिसे चाहता मन रुलाता  बहुत है।  

जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
मिली देख नजरें चुराता बहुत है । 

न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है। 

न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
रसिक  रागिनी बन  रिझाता  बहुत है ।

लगन साधना में यती बन चला जो,
भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।
               
झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
हया प्रेम हो  मन लुभाता बहुत है  ।
                 डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

One Comment

  • Dr.PremLata Tripathi

    शीर्षक —सफर/ यात्रा / भ्रमण
    गीतिका —
    छंद — भुजंग प्रयात (वाचिक)
    मापनी –122 122 122 122
    समांत – आता, पदांत – बहुत है

    सफर हो अकेला सताता बहुत है ।
    तनिक फासले को दिखाता बहुत है।

    कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले जो,
    जिसे चाहता मन रुलाता बहुत है।

    जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
    मिली देख नजरें चुराता बहुत है ।

    न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
    मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है।

    न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
    रसिक रागिनी बन रिझाता बहुत है ।

    लगन साधना में यती बन चला जो,
    भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।

    झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
    हया प्रेम हो मन लुभाता बहुत है ।
    डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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