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सच्चाई स्वीकार करें
गीत मान सभी को प्यारा है पर, झूठे हैं उपमान सभी । क्या मांँगे हम मदद जगत से,बन बैठे अनजान सभी। काँधे जिसके झुके बोझ से, उसका अपना कौन यहांँ । नये दौर की बात निराली, बढ़े मदद को हाथ कहाँ । पीर पराई कहकर अपनी, खोती है पहचान सभी। क्या मांँगे हम मदद जगत से,बन बैठे अनजान सभी। पथ पर बिखरे काँटे फिर भी, कभी न हम पर वार करें। अपनों में ही छिपे पराए, सच्चाई स्वीकार करें। खो देते हैं पलभर में जो, दीन-धर्म ईमान सभी। क्या मांँगे हम मदद जगत से,बन बैठे अनजान सभी। कथनी-करनी में अंतर से, नाते लगते मतलब के। विरले होते संघर्षों में, सदा…
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“द्वार सजाऊँ बंदनवारे”
#गीत शंकर सुवन गणपति आओ,रिद्धि-सिद्धि सह अनुगामी। द्वार सजाऊँ बंदनवारे, दीप प्रज्ज्वलित हो स्वामी। नाद-ताल लय साज सधेंगे। वंदन के स्वर चौमासी ।। अधर-अधर पर जय जयकारा। अंखियांँ कातर नित प्यासी ।। दीन करें मन आर्त्तनाद सुन,नष्ट करो!विपदा कामी। द्वार सजाऊँ बंदनवारे, दीप प्रज्ज्वलित हो स्वामी।। अलि गुन गाए सरस करे प्रिय। मधुरस कलश भरें कलियाँ ।। पीत-वसन ले ध्वजा नारियल। मंदिर तक गातीं सखियांँ ।। गजवदन विनायक की प्रतिमा, पथ पर निकले रथ यात्रा, दर्शन को बढ़े सुनामी। द्वार सजाऊँ बंदनवारे, दीप प्रज्ज्वलित हो स्वामी।। #लता पहन वासंती चूनर, अंग-अंग थिरके नच के । गीत लावणी सहज ऋचाएं, मन भाए कटितट मटके। पहन पीत पट प्रभु गजवदना,शुभकारी अन्तर्यामी ।…
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“दुहराता इतिहास उसी को”
*सजल* समय-समय पर बरखा सावन,और समय से आता पतझड़। नियति बांँचती भाग्य हमारे,सुख-दुख आते हैं उमड़-घुमड़ ।। चूनर दाग न धो पाएगी, हृदय हीन हो रिश्ता-नाता। प्रीति लगन यदि सच है बढ़ती, भले बनाते लोग बतंगड़।। लोक रीति से परे न कोई, नयी-पुरानी सीख समझ लें। सत्य-सनातन बिन कड़ियांँ सब, बिना शीश के लगतीं धड़।। भूले बिसरे गीत हमारे, नयी चेतना को समझाएं। दुहराता इतिहास उसी को, धाक उसी की जो है धाकड़।। महके फागुन में अमराई, कोकिल-काग करें हैं कलरव। मीठी-मीठी वाणी मनहर, झूलें हम डाली पकड़-पकड़।। बादल छौने नभ पर धाएं, काले-भूरे रार मचाएं। गरज उठी घनघोर नाद से, चपला-चमकी नभपर तड़-तड़।। सांँझ सुरमई निशा सुहागन, चातक-नयन हुए…
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लिखे लेखनी जंग
गीत ——— धुंंध-धुंध औ धुंध,प्रलय का पहने बाना । धर्म-कर्म सुविचार,कृत्रिम जाना-पहचाना । लख चौरासी योनि शीर्ष मानव तनधारी । भरे विकट उन्माद, करें दुःखी व्यभिचारी । भोगी तन-मन तंत्र, दीन नैतिकता चादर, अँखियाँ जाती भीग तड़प का दे नजराना । तिल-तिल घटता प्राण, जगा करती कुंठाएं बदली नहीं अनाम, दशा-किस्मत-रेखायें सिहरे तरुवर पात,निशा अलाव बन जागे, घुल जाता जब धैर्य, बुनेगा गीत सयाना । लिखे लेखनी जंग हुए क्यों तंग झरोखे । जीवन के सब रंग दर्द जी रहे अनोखे । टूट चुके हिय बांध, पीड़ा न हृदय समाए, छिड़ा जंग संगीन, चुने ये विकल तराना । ———– डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
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“सजल नयन के कोर”
सजल नयन के कोर…….. करो न आहत हृदय हमारा, कदम बढ़ाया अभी-अभी । वही भरोसा बना रहेगा, कलम उठाया अभी-अभी ।। हुए नहीं जो खुद ही अपने, रिश्ते नाते नये-नये । उठीं सदाएं जगत हितों की, हृदय जगाया अभी-अभी ।। भले शिखर तक पहुँच गए हम, तृषा हवस की डुबा रही । क्या खो चुके हम ये न सोचा, विवश बनाया अभी-अभी ।। बढ़ा हौसले वही गिराते, परख सके हैं कुटिल कहाँ । रही सतत दुविधा लाचारी, हृदय लजाया अभी-अभी ।। दाँव सियासी खेलें देखा, चौपड़ बाजी लगी यहाँ । सजल”नयन के कोर बताते, कि क्या गँवाया अभी-अभी।। उठा शीश है सदा जगत में, चुनी सदा ही उचित राहें ।…
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“उमड़ पड़े हिय ज्वार”
गीत जल से है जलनिधि की गरिमा,हिम से है हिमवान । बूंद-बूंद से सागर जिसके, अगणित हैं उपमान । यत्न-रत्न से गर्भित-गर्वित, उमड़ पड़े हिय ज्वार । चरण पखारे हिम शृंग के, जोड़े अनुपम तार । लहरों पर नित चंद्र उतारे,शोभित उर्मिल प्राण । बूंद-बूंद से सागर जिसके,अगणित हैं उपमान । उठती गिरती फेनिल धारा, वक्षस्थल को चीर । चतुर सयाने यात्रा करते, गहरे खींच लकीर । स्वागत में यह विशाल सागर,भाव भरे उन्वान । बूंद-बूंद से सागर जिसके,अगणित हैं उपमान । विकल हुए संवेदित मन को । जहांँ मिलाती चाह । नदियों का संगम ही सागर, सरितराज-उत्साह । लिखा करेंगी सदियों तक ये,प्रेम सरस सहगान । बूंद-बूंद से सागर…
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“नहीं साँच को आंच बावरे”
_गीत नीति रीति का करें समर्थन,मिट जाये टकराव । आपस की कटुता को मेटे, प्रेम समर्पण भाव । विश्व मंच से पाप-पुण्य के, मुद्दे उठे हजार, दिया समर्थन दोषी को यदि,दोषी स्वयं करार। अपनी क्षमता स्वयं आँकिए, बिना शस्त्र भगवान, भरी अदालत सिद्ध न होता,गवाह बिना दबाव। विनाश काले विपरीत बुद्धि, स्वयं डुबाती नाव। ———————- प्रेम समर्पण भाव । पीर न कोई झूठी होती,पाप करे क्यों राज, अपराधों के बोझ तले जब,दबी मनुजता आज। भगवन तेरी दुनिया में ये,जन्में कैसे ? लोग, कुटिल निरंकुश की अपघातें,उनके बीच चुनाव। नर-नारी के सपने रिश्ते; बनते रिसते घाव । ———————- प्रेम समर्पण भाव । विश्व-युद्ध की आशंका है, सुप्त जगाएं बोध। राष्ट्र-हितों में…
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“अपनी डफली अपना राग”
गीत शून्य चेतना अंध चाह में, दौड़ मचाती भागमभाग । सूझ-बूझ से करें न साझा,अपनी डफली अपना राग । रहे पृथक जो अपने मद में, हठधर्मी जिसका व्यवसाय। नीति धर्म परिवारी जीवन अपनी दुनिया कायम समवाय । मतभेदों का मिथक भरोसा,कलुष भरा कब छूटे दाग । सूझ-बूझ से करें न साझा,अपनी डफली अपना राग । रात घनेरी सुप्त पाँखुरी, कौन सजाये दीपक द्वार । निशा बिछाए बूँद शबनमी, करे धरा जिससे अभिसार । दर्द बनी जो वादी अपनी , खेल हुआ जो खूनी फाग । सूझ-बूझ से करें न साझा,अपनी डफली अपना राग । वारिद बूँदों से भर देता, बहे उफन नदिया उन्माद। दिखा दिया अवसाद मर मिटने पर सभी…
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“भूले बिसरे नगमें “
#गीत गीत गुनें मन सप्त सुरों में, मुझमें नित विश्वास जगाए । मंत्र मुग्ध सी करे यकीनन, अलख साधना प्यास जगाए । तरल तरंगित अंतस्तल की, सहज वेदना लगे सो गई । दूर गगन तक घिरी साँझ की, अमा न जाने कहाँ खो गई । शून्य हुई जब जगत चेतना,कोई आकर पास जगाए । मंत्र मुग्ध सी करे यकीनन,अलख साधना प्यास जगाए । भाग्य भरोसे चला सारथी, जीवन रथ की कहे कहानी । भूले बिसरे नगमें छेड़े , बीते पल की वहीं पुरानी । छलक उठे जो नयन कोर से,सरल तरल अहसास जगाए। मंत्र मुग्ध सी करे यकीनन,अलख साधना प्यास जगाए । कर्म किए जा सार्थक मानव, खोज रहा परिणाम…
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“शुभ-शुभ बोलो माँ कहती”
बाल-गीत भोला बचपन समझ न पाया,शुभ-शुभ बोलो मांँ कहती । देख गगन से टूटा तारा, अनहोनी से जो डरती । बिजली चमके ज्यों घन गरजे, झम-झम ओले बरसे, गहन अंँधेरे से डर जाए, बंद करे खिड़की डर से । सन-सन चलती तेज हवाएं,शुभ-शुभ बोलो मांँ कहती । देख गगन से टूटा तारा,, अनहोनी से जो डरती । कभी न जाना सूनी राहें, किस्से दादी नानी से । घड़ी अशुभ की कभी न आए, अपनी ही नादानी से । चढ़े न हम पर काला जादू,शुभ-शुभ बोलो मांँ कहती । देख गगन से टूटा तारा, अनहोनी से जो डरती । काला धागा बाँध कलाई, सभी बलाएं जो हर ले। प्रेम भरा संसार…




























