“तुमुल युद्ध की परिणति”
सजल
बंजर होती धरती देखें, हुई प्रकृति भी बाम ।
तुमुल युद्ध की परिणति देखें, कैसा यह संग्राम।।
हिला विश्व का कोना-कोना, छिड़ी हुई मुठभेड़।
कुटिल नीतियांँ बाज न आएं,नहीं साम औ दाम।।
वैमनस्य आपद कारी यह, द्वैष बढ़ा मतभेद।
देव-धरा का साथ निभाना, छोड़ो सारे काम।।
शांति-दूत हम सत्य-सनातन, देख सके न जंग।
मिलकर हम संकल्प उठाएं, जगती पर हो नाम।।
मिट न सके चंदन की गरिमा, विषधर लिपटे अंग।
बारूदी संघर्ष कटे अब , मिट जाए ये झाम ।।
वैर-भाव की बातें ओछी, नेक हृदय निष्कर्ष ।
ईश प्रार्थना संकट काटें, मनके-मन के राम।।
स्वप्न ‘लता’ के होंगे पूरे, घूमें देश विदेश ।
चढ़ा सकूँ पुष्पों की माला, मंदिर-गिरजा धाम ।।
—– ——————डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी


