गीतिका

“पाती तुम्हरे आवन की”

#गीत
हरियर पाती भेजे सजना,सुगना बाँचे डाली-डाली ।
पहिरे चुनरी इत-उत डोले,सावन-भादौं की हरियाली ।
गुडिया खेलत नैहर अँगना
लेत बलैया मातु भवनवाँ ।
सखियन के ढिग बैठ मनाऊँ
बाबुल मोहे भेज गवनवाँ ।
हरी लाल पीली मिल गावैं,भरी कलाई चुडियन वाली ।
पहिरे चुनरी इत-उत डोले, सावन-भादौं की हरियाली ।
हरी-भरी अपनी अँगनाई,
पिक-कागन से बगिया चहके ।
बदरा बिजुरी सगर लुभावन,
कदली, बबूल, नीमौ महके ।
बूँदन हर्षित धरा नहायी,बगिया गमके जिनसे आली ।
पहिरे चुनरी इत-उत डोले, सावन-भादौं की हरियाली ।
पाती तुम्हरे आवन की
प्रीति बढावै हरित डगरिया ।
श्वेत अश्व पर वल्गा थामें,
पगडी़ बाँधे चला सँवरिया ।
नयन सजाये सपन बटोही,महिमा जाकी है छविशाली ।
पहिरे चुनरी इत-उत डोले, सावन भादौं की हरियाली ।
डॉ .प्रेमलता त्रिपाठी —————

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