गीतिका

!!हो प्रीत रंग पै भारी!!

आधार छंद – ताटंक / लावणी१६+१४
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गीतिका :-
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रास रंग में डूबा फागुन,ज्यों राग उठे दरबारी ।
पीत पात पथ चहुँदिक् बगरे,अति मुदित लगे मनुहारी ।

हाट बाट गलियारे सजिकै,अबीर गुलाल रंगीला,
होड़ मची परिधानन क्रय की,अँगिया,कंचुकि औ सारी ।

अब की माँगू प्रीतम प्यारे,मैं साथ तुम्हारे खुशियाँ
चढै न दूजो रंग साँवरो, हो प्रीत रंग पै भारी ।

लाल हरे मिल पीत बखानै,पिय ऐसी रंगत भरना
भीगे नैनन प्राण सँवरिया,ये मन भाये पिचकारी ।

कटुता पटुता द्वेष चाकरी,हत करे हृदय छल माया,
आपस के मतभेद मिटा दे,हो प्रेम गीत अविकारी ।
————-डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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