गीतिका

‘डूबती नौका तरंगी’

आधार छंद – सार्द्ध मनोरम
मापनी – 2122 2122 2122
समांत – अना, पदांत – है
गीतिका —–
राह सच होती कठिन ये मानना है ।
झूठ का हर फंद हमको काटना है ।

डूबती नौका तरेगी सच सहारे,
इसलिए जो पथ सही हो सोचना है।

गम नहीं बर्बादियों का फिर बसेगीं,
बस्तियाँ वे ; हों सफल आराधना है ।

कर्म साधक दूर कर मतभेद को हम
पौध खुशियों का हमें फिर रोपना है ।

है चुनौती आज शिक्षा की हमारी,
ज्ञान पाये नित शिखर ये कामना है ।

हिंद के जागृत युवा हों साहसी पर,
देश हित में; स्वार्थ उनको त्यागना है।

लिख सकें यदि प्रेम करुणा की कहानी,
हो सुखद सम भाव लेखन अर्चना है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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