गीतिका

सूर्य तो उगा सखे

प्रदत्त छंद-चामर (वर्णिक)
21,21,21,21,21,21,21,2
समान्त: अगा<>पदान्त: सखे
गीतिका

हार मानना न मौत को गले लगा सखे ।
भाग्य वान हो अहो सुभोर को जगा सखे ।

है अतीव वेदना विराग क्षोभ मानिए ,
दे रहा अकाल ये कराल क्यों दगा सखे ।

दौर आ गया समक्ष साहसी बने स्वयं,
भेद भाव आपसी दुराव को भगा सखे ।

दूरियाँ भले रहें न बाँटिए समाज को,
एक देश एक राष्ट्र गीत मंत्र गा सखे ।

एकता बनी रहे पुनीत राष्ट्र भावना,
भाव दीप्त यों रहे भले न हो सगा सखे ।

द्वंद्व तो अनेक हैं मिटा सके न नेह को
भूल ये सभी गिले खुशी सभी मँगा सखे ।

प्रेम की प्रगाढ़ता सहे अनंत पीर को,
अर्घ नित्य हो नवीन सूर्य तो उगा सखे ।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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