गीतिका

करुणा नयन हे नाथ

छंद – हरिगीतिका (मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी- 2212 2212 2212 2212
अथवा- गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा
समान्त — आते, पदांत – क्यों नही
गीतिका
करुणा नयन हे नाथ अब अपना बनाते क्यों नहीं ?
माया हठी बढ़ती रही उसको मिटाते क्यों नहीं ?

बनते रहे अनजान जगसे देख पीड़ित जन सदा,
सागर शयन अब त्याग भगवन आज आते क्यों नहीं ?

छलनी किया है दुर्जनों ने स्वार्थ भावों के लिए,
आँधी चली है वेग से रस बूंद लाते क्यों नहीं ?

सत मार्ग को छोड़ें नहीं है भावना रखना हृदय,
भ्रमजाल नित अपवाद से जग को बचाते क्यों नहीं ?

कटु कीट दीमक कर रहे हत खोखली दीवार को,
लोभी कृपण को आज फिर दर्पण दिखाते क्यों नहीं ?

हैं लूटते जो देश को धन मान अपनी अस्मिता,
ब्रम्हास्त्र अपना आज भगवन तुम उठाते क्यों नहीं ?
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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