गीतिका

दिन सुहाने आ गये

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आधार छन्द– गीतिका
मापनी-2122 2122 2122 212
समान्त-आने<>पदान्त-आ गये
गीतिका ——-

दीन करती गर्दिशी बातें सुनाने आ गये ।
दो महकने आज मुझको क्यों रुलाने आ गये ।

बीत जाने दो पलों को थे कभी अपने नहीं ।
खोल दो अब खिड़कियों को दिन सुहाने आ गये।

राज जीवन में कभी कुछ भी नहीं था जान लो,
खुल गये कोरक नयन सपने सताने आ गये ।

लेखनी शृंगार करती काव्य धारा में नहा,
पंख लगते अक्षरों को गुनगुनाने आ गये ।

कामनाएँ जागती जो स्वप्न दीर्घा में सदा,
प्रेम की दुनिया अलग हम वह बसाने आ गये ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
कोरक= कली, मुकुल

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