गीतिका

नयी राह चलना

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आधार छंद- वाचिक भुजंगप्रयात
मापनी – 122 122 122 122
लगावली – लगागा लगागा लगागा लगागा
समान्त- अलना, अपदांत

नयी रोशनी में नयी राह चलना ।
दिवा स्वप्न से तुम सदा ही सँभलना ।

चलो साहसी बन सफलता मिलेगी,
खुशी को अहं में नहीं तुम बदलना ।

कहीं मौन मजबूरियाँ बन न जाये,
नहीं सत्य के पथ कभी तुम फिसलना ।

मिले रात काँटों भरी सेज बनकर,
न भयभीत होना नहीं तुम मचलना ।

घड़ी धैर्य की भी न छोटी बड़ी हो,
इरादे रहें नेक मन से न ढलना ।

प्रकृति संपदा जो मिली है सुहानी,
उसे स्वार्थ अपने नहीं तुम मसलना ।

बनो प्रेम दीपक तमस को मिटा दो,
अगर मोम बनकर तुम्हें हो पिघलना ।
डॉ प्रेमलता त्रिपाठी

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