• गीतिका

    ‘डूबती नौका तरंगी’

    आधार छंद – सार्द्ध मनोरम मापनी – 2122 2122 2122 समांत – अना, पदांत – है गीतिका —– राह सच होती कठिन ये मानना है । झूठ का हर फंद हमको काटना है । डूबती नौका तरेगी सच सहारे, इसलिए जो पथ सही हो सोचना है। गम नहीं बर्बादियों का फिर बसेगीं, बस्तियाँ वे ; हों सफल आराधना है । कर्म साधक दूर कर मतभेद को हम पौध खुशियों का हमें फिर रोपना है । है चुनौती आज शिक्षा की हमारी, ज्ञान पाये नित शिखर ये कामना है । हिंद के जागृत युवा हों साहसी पर, देश हित में; स्वार्थ उनको त्यागना है। लिख सकें यदि प्रेम करुणा की कहानी,…

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    ‘ईर्ष्या से कटे न जीवन’

    छंद- सखी /आँसू गीतिका आँसू नहीं सुहाया है । नित्य अधर ने गाया है । प्राच्य दिशा है मनहारी, रवि ने सरस लुभाया है । वसुधा का पावन अंचल, माँ की ही प्रति छाया है । मधु कोष भरें क्यारी हम, कलियों ने समझाया है । शुद्ध चित्त इष्ट- साधना, मन अनंत सुख पाया है । निर्मोही जग ने केवल, मन को नित भरमाया है । ईर्ष्या से कटे न जीवन, प्रेमिल जगत बनाया है । डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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    हो अवतार नहीं है

    छंद “सार” अर्ध सम मात्रिक. शिल्प विधान चौपाई + 12 मात्रा 16+12 28 मात्रा अंत में 22 वाचिक अनिवार्य समांत – आर, पदांत – नहीं है गीतिका नये दौर में लिखना साथी, अपनी हार नहीं है । हैं अतीत के साक्षी हम जो,वे साकार नहीं है । बचपन से जो रीति निभायी, देखी दुनिया सारी , राग द्वेष मनुहार सहज था,अब आधार नहीं है। धन बल की छाया में जीवन,है खो रही जवानी मात पिता की सेवा करने, का सुविचार नहीं है । पाठ पढ़ा था कुल मर्यादा,लज्जा थाती गहना, भाव प्रीति था नत नयनों में,वह शृंगार नहीं है । टूट गए है सभी मिथक अब,मिथ्या संसृति जागी, गोरख धंधे…

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    राजनीति में दंगल

    आधार छंद – सरसी गीतिका — राजनीति दंगल में देखें,कैसा मचा धमाल । मौन धृष्टता करें अराजक,गहरी जिनकी चाल । एक एक कर खुले पुलिंदे,भीतर घाती भेद, नैतिकता का नाम नहीं है,अजब बुना है जाल । सत्ता लोलुप आज तुम्हारा,होगा काम तमाम, कर्म भीरु अब यों कटुता की,नहीं गलेगी दाल । कृत्य घातकी देश विरोधी,कितनी भरें उडा़न, पंख काटते निश्चित अपनी,गिरना उन्हें निढाल । कुटिल आचरण अर्थ कामना,भोग वृत्ति अभिमान, छल-बल घाती कला तुम्हीं ने,अंतस रक्खी पाल । बना तमाशा देख रहा जग,खेद मदारी कौन, आपस की तकरार न छोडे़ सदा बजावें गाल । करनी ओछी करने वाले,बचें ईश नाराच, छद्म प्रेम औ लूट मार को,इन्हे न छोडे़ काल ।…

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    सुन लो खेवनहार

    छंद अहीर (मात्रिक) मात्रा 11 (दोहे का सम चरण ) समांत – आर ,अपदांत गीतिका —- नाव खड़ी मँझधार। सुन ले खेवनहार । सुख दुख होंगें साथ, जीवन में क्रमवार । मिटे पीर प्रभु आस, कर दो बेड़ा पार । मिलन प्रीति संयोग, विरह बढ़ाये ज्वार । माया हरे विवेक, सहज प्रेम संसार । डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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    भोर की लाली

    आधार छंद द्विमनोरम मापनी / शिल्प विधान– 2122,2122,2122,2122 गीतिका गीत मधुरिम रागिनी से पथ बनाते हम चलेंगे । मुश्किलों में साथ अपनों का निभाते हम चलेंगे । शीत कंपित हर दिशा को दे चुनौती रश्मियाँ ज्यों, रवि किरण सतरंग सरसिज को खिलाते हम चलेंगे । भोर की लाली मनोहर काव्य मय लय छंद संगम, आचमन कर हिय सरस हो गुनगुनाते हम चलेंगें । नाव माँझी ले चलो मँझधार से लेकर किनारे, हो खिवैया श्याम – रघुवर गीत गाते हम चलेंगे । प्रेम ये अनमोल बंधन भाव से समृद्ध अर्पण, स्नेहमय विस्तार जीवन ये सजाते हम चलेंगे । डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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    काल चक्र

    छंद लावणी/ताटंक मात्रा = 30 16,14, पर यति समांत – आयी पदांत है गीतिका…… काल काल ये काल चक्र है,ये लघु दीर्घ न ढायी है। जूझ रहे हम सभी समय की,चाल समझ कब आयी है । बीते पल की यादें अपनी,चिंतन खोने – पाने का, अगम अनागत अंत नहीं कुछ,बातें जहाँ समायी है । शुभ चिंतन में अविराम रहें,होनी हो कर ही रहती, संघर्ष रहेगा जीवन भर,अंत भला हो भायी है । बुनते ताने बाने जो हम,भरम जाल में फाँसे खुद को, करनी का फल वही मिलेगा,सुखदा या दुखदायी है। त्याग प्रेम है जीवन अर्पण,लघुता पीडा़ है मन की , करुणा मोती अंतस जिसके,खुशी वहीं मुस्कायी है । डॉ. प्रेमलता…

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    वर्ष बीस बीस

    छंद विधाता मापनी- 1222,1222,1222,1222 गीतिका —– दुखी है लेखनी अपनी,कहाँ खोया हमारा कल । किया शृंगार कब तुमने,न यादों में उभरता पल । मिटा हस्ती रहा अपनी, कि दुर्दिन घातकी बनकर, नजर किसकी लगी हमको,गया यह वर्ष करता छल । उठाती टीस है जैसे, दरों दीवार ये आँगन, मिटेगी वेदना निश्चित,हवायें कह रहीं चंचल । धरा ये रत्न गर्भा है, पुनीता है बडी़ मुग्धा, तुम्हें सौगंध इसकी है,सुनो हलधर तुम्हीं संबल । मुकुट मण्डित हिमालय से,भरत भू संपदा अपनी, कहें; ये आँसुओं से अब,न करना तुम तरल आँचल । चहकती प्रात किरणों से,झरोखे खोल कर देखो, सरोवर फिर सुवासित हों,भरे मुस्कान ये शतदल । मृदुल मन प्रेम रस घोलो, उठे…

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    सुरमई साँझ

    आधार छंद माधव मालती — गीतिका —– सुरमयी ये साँझ गाती गुनगुनाती जा रही है । ये शरद की चाँदनी मन को लुभाती जा रही है । टिमटिमाती तारिकाएँ ,झूमती है पाँखियाँ भी, रागिनी सरगम भरे ये नभ सजाती जा रही है । ये अमावस पूर्णिमा की है कथा सदियों पुरानी, मोहनी ये वक्त की पहचान कराती जा रही है । दिन पुराने बीत जाते कट रही रातें सभी यूँ, ये मिलन की या कभी विरहन बनाती जा रही है । प्रेम का गर हो सहारा,हो नहीं जीवन अकेला, नित सुवासित हर सुबह आ मुस्कराती जा रही है । डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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    “आकाश दो”

    छंद- वाचिक स्रग्विणी विधान- 212 212 212 212 देखकर जो तुम्हें जी लिया है सदा । आचमन यों सुधा का किया है सदा । पंख खोले हवा में यूँ आकाश दो, स्वाँस गाये जहाँ बन प्रिया है सदा । प्रीत निर्मल बिखेरे कली से सुमन, अलि मगन सोम रस में जिया है सदा । वर्तिका के बिना दीप जलता नहीं, पर कहें जल रहा यों दिया है सदा । वात कंपित शिखा वत न बुझना मुझे, ये हवायें जलातीं हिया है सदा । प्रीति मीरा बनी जो अमर हो गयी, प्रेम जिसने गरल ही पिया है सदा । डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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