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“बंधन प्यारा”
#गीत ————— बंधन प्यारा नेह देह का,बुनकर ताना बाना । रोते रोते आये थे हम, हँसना जग से जाना । लुक छुप करते बचपन बीता,आयी जब तरुणाई । मुड़ कर तेरा दीद करूँ क्या, हँसती है अरुणाई । सब रस बाहें फैलाये वह, सुंदर लगा सबेरा, ऊँच नीच या भेदभाव हो, कोई नहीं बहाना । रोते रोते आये थे हम, हँसना जग से जाना । समझ न आये किस पथ जाना,फूल कहीं थे काँटे । सुख दुख की छाया में बीते, मिलकर हमने बाँटे । अपने और पराये की नित, दुनिया करे बखेड़ा, जगत साधना सत्कर्मों की,उसको सफल निभाना । रोते रोते आये थे हम, हँसना जग से जाना ।…
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“साज दे अनिंद्य तेज”
#गीत चामर छंद (वर्णिक) शारदे सँवार दे अबोध को विचार से । साज दे अनिंद्य तेज लेखनी निखार से । अक्स अक्स खींच दे सँवार दे अनंत को । नीर तीर में सजे निखार दे दिगंत को । अभ्र श्वेत खेलते पवित्र भाव संत को । मध्य भानु हैं छिपे सचित्र नेक कंत को। वंदना लिखें अजोर प्यार से दुलार से । साज दे अनिंद्य तेज लेखनी निखार से । जीव-जंतु लोक हेतु पंचतत्व है जहाँ । धूप छाँव से सँवार प्राण सत्व है जहाँ जीत हार बेशुमार मानकत्व है जहाँ । राष्ट्र प्रेम भावना कृते घनत्व¹ है जहाँ । गा उठे वसुंधरा अगम्य नव्य सार से । साज दे…
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“किलकारी से गूँजे उपवन”
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ…. #गीत खिले मनुजता सजे वाटिका,अगणित हैं उपनाम। बाल रूप ज्यों लिए कन्हाई, आए छवि के धाम । मातु गर्भ से पाकर अभिनव, करिए जीवन सार । शोभा शाली संसृतिअपनी, जग की पालन हार । हर बाला हो दिव्य अंगना,हर बालक हो राम । बाल रूप ज्यों लिए कन्हाई,आए छवि के धाम । पंचतत्व से निर्मित काया, मिल जाए फिर रेह । सूर्य चंद्र से अंध कटे ज्यों, साँझ ढले नित स्नेह । किलकारी से गूँजे उपवन,सुंदर हो विश्राम । बाल रूप ज्यों लिए कन्हाई,आए छवि के धाम । आँजे कोमल #लता प्रेम की, करिए वह अनुबंध । नियति प्रेम की सत्य सर्जना, प्रेम लिए सौगंध…
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चमके भानु प्रताप……
#गीत (आधार छंद सरसी) प्रात सजाए पूजा थाली,धूप दीप से जाप । अक्षत दुर्वा कुंकुम माथे,चमके भानु प्रताप। सरजू तट के रहवासी जो,अवध पुरी के नाम । राम बसे प्रति हृदय जहाँ पर,वृहद साधना धाम । मर्यादा पाथेय मिला जो, भाव भरे निष्काम । करतल करते बरगद पीपल,हरते मन संताप, अक्षत दुर्वा कुंकुम माथे,चमके भानु प्रताप। —————- रूप कंचनी आभा फैले, प्राची का शृंगार । सार जगत में प्रेम यहाँ पर,भर दे मन उद्गार । साँझ सुहानी लगती प्यारी,प्रिया खड़ी ज्यों द्वार। अधरों पर नित भाव व्यंजना,लगे सुखद आलाप, अक्षत दुर्वा कुंकुम माथे,चमके भानु प्रताप। ——————– मन वाणी सत्कर्म नीतियाँ,मिलती जहाँ सुयोग। वचनबद्धता रही यथावत ,युग-युग गायें लोग । मान…