गीतिका

“नेह का आब दाना”

आधार छद – विध्वंक माला
मापनी….. २२१ २२१ २२१ २२
पदान्त….आना
“गीतिका”
ऋतुराज मोहक लगा ये सयाना ।
जिसने भरा नेह का आब दाना ।

रुनझुन चली ठंड यों गुनगुनाती,
पीहर गली है उसे जो सजाना ।

आओ चलें राग जीवन सजायें,
चाहत भरा एक नवछंद गाना ।

रिश्ते सजे रंज रंजिश भुलाकर ।
अंतस महकता हमें यों बनाना ।

मधुरस पगे पुष्प चहुँदिक लुभाये,
फागुन वसंती तराने सुनाना ,

कर दो सरस सिक्त आकाश गंगे,
तुमने सिखाया द्रवित भीग जाना ।

कटुता मिटे घुल सके प्रेम करुणा,
ईर्ष्या जगत से हमें है मिटाना ।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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